हैदराबादी हलीम का स्वाद क्यों है खास? जानिए इसका इतिहास और बनाने का तरीका

हैदराबादी हलीम का स्वाद क्यों है खास? जानिए इसका इतिहास और बनाने का तरीका

सालेहा वसीम 

हलीम रमज़ान का एक मशहूर व्यंजन है, लेकिन हैदराबाद में इसकी लोकप्रियता पूरे साल बनी रहती है। 2010 में हैदराबादी हलीम को भारत सरकार के जीआई रजिस्ट्रेशन के तहत GI Tag मिला था, जो इसकी पारंपरिक पहचान को प्रमाणित करता है। इतिहासकारों और फूड रिसर्च डॉक्यूमेंट्स के अनुसार हलीम की शुरुआत मध्य-पूर्व से मानी जाती है, जहाँ यह हरेस या हरीसा नाम से बनाया जाता था। 19वीं सदी के अंत में यह पकवान दक्कन तक पहुँचा और धीरे-धीरे निज़ाम शासन के दौरान हैदराबाद की रसोई का स्थायी हिस्सा बन गया। स्थानीय मसालों, दालों और पकाने की तकनीक ने इसे “हैदराबादी हलीम” के अनोखे स्वाद में बदल दिया, जो आज दुनिया भर में मशहूर है।

हलीम को बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया काफी मेहनत वाली होती है। इसके लिए कुटे हुए गेहूं, चना दाल, मसूर दाल और मटन का इस्तेमाल किया जाता है। दाल और गेहूं को रातभर भिगोने के बाद गाढ़ा होने तक पकाया जाता है। मटन को मसालों के साथ धीमी आँच पर पकाया जाता है और फिर उसे रेशा करके दाल-गेहूं के मिश्रण में मिलाया जाता है। इसके बाद इस पूरी मिश्रण को 6 से 8 घंटे तक धीमी आँच पर दम दिया जाता है, जिससे इसका टेक्सचर क्रीमी और स्मूद बनता है। पकने के बाद इसमें देसी घी, तली हुई प्याज़, नींबू और हरी मिर्च से गार्निश किया जाता है। यही लंबी पकाने की प्रक्रिया और घी-मसालों का संतुलन हलीम को उसका असली हैदराबादी स्वाद देता है।

फूड हिस्ट्री रिपोर्ट्स और दक्कन स्टडीज़ के अनुसार हलीम हैदराबाद में इसलिए भी जल्दी लोकप्रिय हुआ क्योंकि यह पौष्टिक, एनर्जी देने वाला और रमज़ान के रोज़ेदारों के लिए भरपूर भोजन माना जाता था। समय के साथ यह सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं रहा, बल्कि हैदराबाद की सांस्कृतिक पहचान बन गया। आज शहर की कई मशहूर दुकानों और होटलों में हलीम एक खास डिश के रूप में सालभर उपलब्ध रहती है।