खजाने पर सियासी संग्राम: क्या सचमुच आर्थिक संकट में है बिहार सरकार
उफ़क साहिल
बिहार की सियासत में इन दिनों सरकारी खजाने को लेकर घमासान मचा हुआ है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि राज्य की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर हो चुकी है और सरकार के पास खर्च चलाने तक के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं बचे हैं। इस बीच राज्य सरकार की ओर से जारी एक आधिकारिक पत्र ने राजनीतिक हलकों में हलचल और तेज कर दी है।
राज्य सरकार के वित्त विभाग द्वारा जारी एक पत्र में विभागों को अनावश्यक खर्चों पर रोक लगाने और वित्तीय अनुशासन बरतने के निर्देश दिए गए। विपक्ष ने इसे “खजाना खाली” होने का प्रमाण बताया है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार पर आरोप विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने लगाया है। राजद नेताओं का कहना है कि सरकार आर्थिक प्रबंधन में विफल रही है।
पूरा मामला बिहार राज्य से जुड़ा है, जहां आगामी महीनों में कई विकास योजनाओं और प्रशासनिक खर्चों का दबाव भी है।
सरकार ने विभागों से कहा है कि नई योजनाओं की स्वीकृति से पहले वित्तीय उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। विपक्ष का दावा है कि यह कदम संसाधनों की कमी के कारण उठाया गया है। वहीं सरकार का तर्क है कि यह नियमित वित्तीय प्रबंधन और खर्चों पर नियंत्रण की प्रक्रिया का हिस्सा है।
वित्तीय निर्देशों की प्रति सार्वजनिक होते ही राजद ने प्रेस वार्ता कर सरकार पर हमला बोला। आरोप लगाया गया कि विकास कार्य ठप पड़ सकते हैं। सरकार ने जवाब दिया कि राज्य की वित्तीय स्थिति स्थिर है और यह केवल राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने का कदम है।
सरकार के सूत्रों का कहना है कि हर वित्तीय वर्ष के अंत में खर्चों की समीक्षा और नियंत्रण सामान्य प्रक्रिया है। अधिकारियों का दावा है कि वेतन, पेंशन और चल रही योजनाओं के भुगतान में कोई बाधा नहीं आएगी।
राजद नेताओं ने कहा कि यदि स्थिति सामान्य है तो खर्चों पर अचानक रोक क्यों लगाई गई? उन्होंने इसे प्रशासनिक विफलता और आर्थिक कुप्रबंधन का परिणाम बताया। विपक्ष ने यह भी मांग की है कि सरकार राज्य की वास्तविक वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करे।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले सत्र में जोरदार बहस का विषय बनेगा। यदि सरकार विस्तृत वित्तीय आंकड़े सार्वजनिक करती है तो स्थिति स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल, “खजाना खाली” बनाम “वित्तीय अनुशासन” की जंग ने बिहार की राजनीति को गर्म कर दिया है।
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