न यूट्रस, न ओवरी, पुरुषों वाले क्रोमोसोम… फिर भी मां बनना चाहती थी महिला डॉक्टर, हाई कोर्ट के फैसले ने बदल दी किस्मत

हैदराबाद की 32 वर्षीय महिला डॉक्टर दुर्लभ जेनेटिक स्थिति के कारण प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं कर सकती थीं। हेल्थ डिपार्टमेंट ने उन्हें सरोगेसी के लिए एलिजिबिलिटी सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया, जिसके बाद मामला तेलंगाना हाई कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने कहा कि केवल तकनीकी या क्रोमोसोम संबंधी कारणों के आधार पर किसी कपल को माता-पिता बनने से नहीं रोका जा सकता।

न यूट्रस, न ओवरी, पुरुषों वाले क्रोमोसोम… फिर भी मां बनना चाहती थी महिला डॉक्टर, हाई कोर्ट के फैसले ने बदल दी किस्मत

मां बनना लगभग हर महिला का सपना होता है, लेकिन कभी-कभी प्रकृति ऐसी परिस्थितियां पैदा कर देती है कि यह सपना अधूरा सा लगने लगता है। हैदराबाद की एक 32 वर्षीय महिला डॉक्टर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसने अपनी अनोखी मेडिकल स्थिति और सिस्टम की बंदिशों के खिलाफ लड़ते-लड़ते आखिरकार हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

इस महिला डॉक्टर को एक दुर्लभ जेनेटिक बीमारी है। मेडिकल जांच में सामने आया कि उनके शरीर में न तो गर्भाशय (यूट्रस) है और न ही अंडाशय (ओवरी)। इतना ही नहीं, उनके क्रोमोसोम भी सामान्य महिलाओं की तरह नहीं हैं। इस वजह से वह प्राकृतिक तरीके से गर्भधारण नहीं कर सकती थीं।

जब उन्होंने मां बनने के लिए सरोगेसी का रास्ता अपनाने की कोशिश की, तो उन्हें एक और बड़ी बाधा का सामना करना पड़ा। हेल्थ डिपार्टमेंट ने उनकी मेडिकल स्थिति का हवाला देते हुए उन्हें सरोगेसी के लिए जरूरी एलिजिबिलिटी सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया। विभाग का तर्क था कि नियमों के मुताबिक उनकी स्थिति सरोगेसी की अनुमति के दायरे में नहीं आती।

अपने सपने को टूटने से बचाने के लिए महिला डॉक्टर ने न्यायालय का रुख किया। मामला तेलंगाना हाई कोर्ट तक पहुंचा, जहां अदालत ने इस पर गंभीरता से सुनवाई की। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल तकनीकी कारणों या क्रोमोसोम की स्थिति के आधार पर किसी दंपती को माता-पिता बनने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट के इस फैसले को कई लोग मानवीय और प्रगतिशील कदम मान रहे हैं। अदालत ने यह संकेत दिया कि मेडिकल और कानूनी नियमों की व्याख्या करते समय इंसानियत और संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

इस फैसले के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि महिला डॉक्टर के लिए सरोगेसी का रास्ता खुल सकेगा और वह अपने मां बनने के सपने को पूरा करने के करीब पहुंच सकेंगी। यह मामला सिर्फ एक महिला की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, बल्कि उन कई लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन सकता है जो मेडिकल कारणों से माता-पिता बनने के रास्ते में कानूनी बाधाओं का सामना करते हैं।