दुनिया की सबसे खतरनाक समुद्री गली! आखिर ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर कंट्रोल क्यों नहीं कर पाते बाहरी देश?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का बेहद अहम समुद्री मार्ग है, जहां से वैश्विक तेल और एलएनजी का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ईरान की भौगोलिक स्थिति, मिसाइल सिस्टम और असममित युद्ध रणनीति के कारण यहां बाहरी देशों के लिए नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है। बढ़ते खतरे और आर्थिक जोखिम की वजह से कई यूरोपीय देश इस क्षेत्र में सैन्य भूमिका निभाने से पीछे हट रहे हैं।
दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस तेल और गैस पर टिकी है, उसका बड़ा हिस्सा एक बेहद संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। यह रास्ता है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जो एक बार फिर वैश्विक राजनीति और सुरक्षा के केंद्र में आ गया है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण यह जलडमरूमध्य एक बार फिर संवेदनशील क्षेत्र बन चुका है। यही वजह है कि कई यूरोपीय देश अब इस इलाके में सक्रिय सैन्य भूमिका निभाने से पीछे हटते नजर आ रहे हैं।
दरअसल, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की भौगोलिक स्थिति इसे दुनिया के सबसे रणनीतिक और खतरनाक समुद्री मार्गों में से एक बनाती है। इसकी कुल चौड़ाई लगभग 21 मील है, लेकिन जहाजों के सुरक्षित आवागमन के लिए उपलब्ध रास्ता इससे भी कहीं कम है। इस संकरे मार्ग के समानांतर ईरान की लंबी तटरेखा है, जिससे उसे इस पूरे इलाके पर रणनीतिक बढ़त मिलती है।
ईरान ने अपने तटों और आसपास के द्वीपों—जैसे होर्मुज, केशम और लारक—पर आधुनिक मिसाइल सिस्टम तैनात कर रखे हैं। यही कारण है कि किसी भी बाहरी देश के लिए यहां अपनी नौसेना की ताकत दिखाना आसान नहीं है। बड़े युद्धपोत और विमानवाहक पोत इस संकरे इलाके में आसानी से निशाना बन सकते हैं।
ईरान की सैन्य रणनीति भी पारंपरिक युद्ध से अलग है। वह ‘असममित युद्ध’ की रणनीति अपनाता है, जिसमें बड़ी नौसेना के बजाय छोटी और तेज रफ्तार नावों का इस्तेमाल किया जाता है। ये नावें मिसाइल और टॉरपीडो से लैस होती हैं और झुंड में हमला करती हैं। ऐसे हमलों से भारी-भरकम युद्धपोतों को बचाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
इसके अलावा ईरान के पास समुद्री बारूदी सुरंगें बिछाने की क्षमता भी है। अगर इस रास्ते में एक भी सुरंग विस्फोट हो जाए, तो पूरे क्षेत्र में जहाजों का बीमा खर्च तेजी से बढ़ जाता है और कई व्यापारी जहाज इस मार्ग से गुजरने से कतराने लगते हैं। हाल के समय में जीपीएस और नेविगेशन सिस्टम में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग की घटनाओं ने भी जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
इसी वजह से यूरोपीय देश अब इस क्षेत्र में सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचते दिखाई दे रहे हैं। उन्हें डर है कि यदि वे अमेरिका या इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई का हिस्सा बनते हैं, तो उनके व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। अतीत में ईरान ने ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय टैंकरों को जब्त कर अपनी प्रतिक्रिया भी दिखाई है।
वैश्विक स्तर पर भी इस क्षेत्र का महत्व बहुत बड़ा है। दुनिया के लगभग 20 से 25 प्रतिशत कच्चे तेल और एलएनजी की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। ऐसे में अगर यहां तनाव बढ़ता है या मार्ग बाधित होता है, तो तेल की कीमतों में अचानक उछाल आ सकता है और इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
यूरोप पहले से ही रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। ऐसे में वह किसी नए सैन्य टकराव का जोखिम उठाने के बजाय कूटनीतिक रास्ता अपनाने की कोशिश कर रहा है। यही कारण है कि कई यूरोपीय देश इस संवेदनशील समुद्री क्षेत्र से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं।

