'सेक्स एजुकेशन' कोई बुराई नहीं बल्कि इसकी जानकारी बच्चों की जान बचा सकती है।

भारत में यौन शिक्षा को आमतौर पर एक “टैबू टॉपिक” माना जाता है, जो इसमें एक बड़ी बाधा बनती है। यौन शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ यौन संबंध, यौन संचारित बीमारियाँ (STDs) और यौन स्वच्छता से जुड़ी जानकारी देना नहीं है, बल्कि यह युवाओं को उनके शरीर, रिश्तों और यौन स्वास्थ्य के बारे में बताना भी है। सेक्स एजुकेशन बच्चों और युवाओं को न केवल शारीरिक बदलावों को समझने में मदद करती है, बल्कि उन्हें जिम्मेदारी से फैसले लेना, सहमति को महत्व देना और सुरक्षित व सम्मानजनक रिश्ते बनाना भी सिखाती है।

Dec 17, 2025 - 13:41
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'सेक्स एजुकेशन' कोई बुराई नहीं बल्कि इसकी जानकारी बच्चों की जान  बचा सकती है।
सांकेतिक

नेशनल डेस्क : हमारे बच्चे जितनी तेज़ी से बड़े हो रहे हैं उतनी ही तेज़ी से उनके मस्तिष्क में यौन शिक्षा को लेकर जिज्ञासा भी बढ़ती है।  बच्चों के मन में अपने शरीर में हो रहे बदलाव और अपने रिश्तों को लेकर कई सवाल खुद-ब-खुद उत्पन्न होने लगते हैं। ये सवाल बिल्कुल नॉर्मल होते हैं, लेकिन वे डर, शर्म और झिझक की वजह से अक्सर इन पर खुलकर बात नहीं कर पाते। वे सोचते हैं कि लोग क्या सोचेंगे या उन्हें यह बताया ही नहीं गया कि इन मुद्दों पर बात करनी है भी या नहीं। यह भी सोचते हैं कि अगर इस पर बात करनी है  तो कैसे करनी है। इसका नतीजा यह होता है कि वे अपने सवालों के जवाब गलत जगहों से ढूंढने लगते हैं। कभी दोस्तों से सुनी-सुनाई बातें सच मान लेते हैं तो कभी इंटरनेट या पोर्न साइट्स से गलतफहमियां पाल लेते हैं। जिसकी वजह से वह पूरी ज़िन्दगी गलत रास्ते पर चलने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

आज जब बच्चों की ज़िंदगी में इंटरनेट और सोशल मीडिया का बहुत गहरा असर है, तो यौन शिक्षा की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है। कई रिसर्च जैसे कि UNESCO (2018) की रिपोर्ट बताती है कि जिन बच्चों को सही समय पर यौन शिक्षा मिलती है, वे अपनी सेहत और रिश्तों को लेकर बेहतर फैसले लेते हैं और यौन बीमारियों या अनचाही प्रेगनेंसी जैसी मुश्किलों से बचने की कोशिश करते हैं। क्यूंकि उन्हें इस बात की पूरी जानकारी होती है कि यौन शिक्षा उन्हें  न केवल उनके  शरीर को समझने में मदद करती है बल्कि यह उन्हें  सिखाती है कि वह खुद को और दूसरों को इज़्ज़त कैसे दें और कैसे सेफ और हेल्दी रिश्ते बनाएं।

सेक्स एजुकेशन को कैसे समझें ?
सेक्स एजुकेशन वह जानकारी है जो सिर्फ सेक्स के बारे में ही नहीं बताती, बल्कि यह हमें हमारे शरीर, रिश्तों और यौन स्वास्थ्य को समझने में भी मदद करती है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमारे शरीर और मन में कई सवाल उठते हैं: मेरा शरीर क्यों बदल रहा है? ये फीलिंग्स क्यों आ रही हैं? क्या ये नॉर्मल है? लेकिन जब वो सवाल आप किसी से पूछ नहीं पाते तब आप अधूरी या ग़लत जानकारी पर भरोसा करने लगते हैं।

सेक्स एजुकेशन की शुरुआत हमारे खुद के शरीर को समझने से होती है। अगर हम अपने शरीर की बनावट और उसमें होने वाले बदलावों को पहचानेंगे, तभी हम उससे जुड़ी जरूरतों को समझ पाएंगे। यह जानना इसलिए ज़रूरी है ताकि लोग अपने शरीर को समय पर समझें और जरूरत हो तो सही वक्त पर डॉक्टर से सलाह लें। एक अध्ययन में यह देखा गया कि जिन युवाओं को पूरी और सही सेक्स एजुकेशन मिली थी, वो पहली बार सेक्स करते समय ज्यादा सतर्क रहे। उन्होंने कंडोम और दूसरे गर्भनिरोधक उपायों का सही तरीके से इस्तेमाल किया। आज अपने पार्टनर से खुलकर बात करना जरूरी है, चाहे वह बात इच्छाओं को लेकर हो या आपकी तय की गयी सीमाओं को लेकर। इससे रिश्ते में सम्मान और भरोसा बना रहता है।

यौन और कानूनी अधिकार। 
यौन अधिकार (sexual rights) का मतलब है कि हर व्यक्ति को ये हक हो कि वो अपनी इच्छा से तय कर सके कि कब, किसके साथ और कैसे यौन संबंध बनाए।
भारत में कानूनी सहमति की उम्र 18 साल है। इससे कम उम्र में यौन संबंध बनाना कानूनी अपराध है। 
POCSO (Protection of Children from Sexual Offences Act) कानून 18 साल से कम उम्र के बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए है।

डिजिटल युग और सेक्स एजुकेशन
आज इंटरनेट से जानकारी पाना तो आसान है, लेकिन उसमें सही और गलत जानकारी की पहचान बहुत जरूरी है, क्योंकि पॉर्न, सोशल मीडिया और अश्लील कंटेंट कई बार लोगों की सोच को भ्रमित कर देते हैं। सेक्स एजुकेशन से हमें पता रहता है कि ऑनलाइन क्या देखना है, कैसे सुरक्षित रहना है और सही जानकारी कहां से पानी है।

भारत में यौन, प्रजनन स्वास्थ्य और सेक्स एजुकेशन की स्थिति। 
भारत में हाल ही में किए गए अध्ययनों से यह सामने आया है कि देश के युवाओं में हाई रिस्क वाले यौन व्यवहार काफी प्रचलित हैं। इनमें कंडोम का कम उपयोग, एक से अधिक सेक्सुअल पार्टनर का होना, यौन संचारित संक्रमण (STIs) व HIV के प्रति कम जागरूकता प्रमुख हैं। बाल विवाह और किशोरावस्था में प्रेगनेंसी आज भी गंभीर समस्या बने हुए हैं। भारत में लगभग 45% महिलाएं 24 वर्ष की उम्र से पहले शादी  कर लेती हैं, जिनमें से 11.9% की शादी 15 से 19 वर्ष की उम्र में होती है। चिंताजनक रूप से, इनमें से लगभग एक-तिहाई लड़कियाँ 19 वर्ष की आयु से पहले ही कम से कम एक बच्चे को जन्म दे चुकी होती हैं।

भारत में यौन शिक्षा को आमतौर पर एक “टैबू टॉपिक” माना जाता है, जो इसमें एक बड़ी बाधा बनती है। यौन शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ यौन संबंध, यौन संचारित बीमारियाँ (STDs) और यौन स्वच्छता से जुड़ी जानकारी देना नहीं है, बल्कि यह युवाओं को उनके शरीर, रिश्तों और यौन स्वास्थ्य के बारे में बताना भी है। सेक्स एजुकेशन बच्चों और युवाओं को न केवल शारीरिक बदलावों को समझने में मदद करती है, बल्कि उन्हें जिम्मेदारी से फैसले लेना, सहमति को महत्व देना और सुरक्षित व सम्मानजनक रिश्ते बनाना भी सिखाती है। आज के डिजिटल युग में जहां गलत जानकारी आसानी से पहुंच जाती है, वहां सही यौन शिक्षा पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई है। इसके लिए परिवार, स्कूल और समाज सभी को मिलकर खुला, समझदार और सहयोगात्मक वातावरण बनाना होगा, ताकि हर युवा सही जानकारी से सशक्त होकर अपने भविष्य को सुरक्षित और स्वस्थ बना सके।

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