2027 से पहले क्यों सबको याद आने लगे कांशीराम? दलित राजनीति के ‘मास्टरमाइंड’ की विरासत पर क्यों छिड़ी नई सियासी जंग
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अचानक बसपा संस्थापक कांशीराम की विरासत पर सियासी हलचल तेज हो गई है। सपा, कांग्रेस और बीजेपी—तीनों ही दल उनके नाम और विचारों का जिक्र कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर क्यों कांशीराम की राजनीति फिर से केंद्र में आ गई है और इसका बसपा की भविष्य की राजनीति से क्या संबंध है।
2027 से पहले कांशीराम की विरासत पर सियासत
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर कांशीराम का नाम तेजी से चर्चा में है। 2027 विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन सियासी दलों ने अभी से अपने समीकरण बनाना शुरू कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ बहुजन समाज पार्टी ही नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी कांशीराम की विरासत का जिक्र कर रही हैं! राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इसके पीछे सबसे बड़ी वजह उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति और बदलते वोट समीकरण हैं।
दलित राजनीति के सबसे बड़े रणनीतिकार
कांशीराम को आधुनिक भारत में दलित राजनीति का सबसे बड़ा रणनीतिकार माना जाता है। उन्होंने 1980 और 1990 के दशक में दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों को संगठित कर एक नई राजनीतिक ताकत खड़ी की। उनकी बनाई बहुजन समाज पार्टी ने 2007 में उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई, जिसे भारतीय राजनीति में सामाजिक समीकरणों के बड़े प्रयोग के रूप में देखा जाता है। उनका नारा—“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी”—आज भी सामाजिक न्याय की राजनीति में प्रभावी माना जाता है।
2027 चुनाव और बदलते वोट समीकरण
2024 लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोटों की दिशा को लेकर नई बहस शुरू हुई है। विश्लेषकों का कहना है कि दलित वोट बैंक अब पहले की तरह पूरी तरह एक ही पार्टी के साथ नहीं रहा। कई जगहों पर इसका झुकाव अलग-अलग दलों की ओर देखा गया है। इसी वजह से 2027 के चुनाव से पहले राजनीतिक दल दलित समाज के बड़े प्रतीक कांशीराम की विरासत को अपने पक्ष में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।
सपा का PDA फॉर्मूला और कांशीराम
अखिलेश यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी “PDA” यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक गठजोड़ की रणनीति पर काम कर रही है। इसी रणनीति के तहत पार्टी कांशीराम की जयंती जैसे आयोजनों को राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण बना रही है। विश्लेषकों का मानना है कि सपा दलित और पिछड़े वोटों को साथ लाने की कोशिश में कांशीराम की राजनीतिक विरासत का सहारा ले रही है।
बीजेपी की नई सामाजिक रणनीति
दूसरी ओर बीजेपी भी दलित समाज तक अपनी पहुंच मजबूत करने की कोशिश कर रही है। रिपोर्टों के अनुसार पार्टी ने दलित समाज के कई बड़े नेताओं और संतों की जयंती-पुण्यतिथि मनाने की रणनीति बनाई है, जिनमें कांशीराम का नाम भी शामिल है। इसका मकसद दलित समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना है।
कांग्रेस भी कर रही बहुजन राजनीति की बात
कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। पार्टी के कई कार्यक्रमों में सामाजिक न्याय और बहुजन राजनीति का मुद्दा उठाया जा रहा है, जिसमें कांशीराम की राजनीतिक विरासत का जिक्र भी किया जा रहा है। हालांकि BSP का आरोप है कि ये पार्टियां केवल चुनावी फायदे के लिए कांशीराम को याद करती हैं।
BSP के लिए भी अहम है कांशीराम की विरासत
कांशीराम की विरासत सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मायावती और उनकी पार्टी BSP के लिए है। मायावती लगातार अपने भाषणों में कांशीराम के मिशन और बहुजन आंदोलन की चर्चा करती हैं। पार्टी 2027 के चुनाव में अकेले मैदान में उतरकर अपनी राजनीतिक ताकत फिर से साबित करना चाहती है।
असल सवाल: किसे मिलेगा कांशीराम की राजनीति का लाभ?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े सामाजिक नेता की विरासत चुनावी मुद्दा बनी हो। लेकिन 2027 से पहले कांशीराम के नाम पर जिस तरह अलग-अलग दल अपनी रणनीति बना रहे हैं, उससे साफ है कि आने वाले चुनाव में दलित राजनीति और सामाजिक समीकरण सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाले हैं। अब देखना यह होगा कि कांशीराम की विरासत का राजनीतिक फायदा किसे मिलता है—BSP को, या फिर अन्य दलों को जो उनकी राजनीति को नए तरीके से पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

