7 साल से मशीनों के सहारे चल रही थी जिंदगी… कौन हैं हरीश राणा, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने इतिहास में पहली बार दी इच्छामृत्यु की इजाजत?
सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह भारत के न्यायिक इतिहास में पहली बार है जब किसी व्यक्ति को अदालत की अनुमति से जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की इजाजत दी गई है।
सात साल की पीड़ा और एक ऐतिहासिक फैसला
कभी सामान्य जिंदगी जीने वाले गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा आज पूरे देश में चर्चा का विषय बन गए हैं। वजह है सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला, जिसमें अदालत ने उन्हें पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है। यह फैसला न केवल एक व्यक्ति की पीड़ा से जुड़ा है, बल्कि भारत में जीवन और मृत्यु से जुड़े संवेदनशील कानूनी सवालों को भी नई दिशा देता है।
आखिर क्या हुआ था हरीश राणा के साथ?
बताया जाता है कि हरीश राणा पिछले कई वर्षों से गंभीर चिकित्सीय स्थिति में थे। एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या के बाद वे ऐसी अवस्था में पहुंच गए थे जहां वे पूरी तरह से जीवन रक्षक मशीनों पर निर्भर हो गए थे। डॉक्टरों के अनुसार उनकी स्थिति में सुधार की संभावना बेहद कम थी। लंबे समय से चले आ रहे उपचार और शारीरिक पीड़ा के बीच परिवार ने अदालत से मानवीय आधार पर हस्तक्षेप की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
इस मामले की सुनवाई जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने की। अदालत ने मामले के सभी पहलुओं, चिकित्सीय रिपोर्ट और मानवीय गरिमा के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी। यह भारत के न्यायिक इतिहास में पहली बार हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट ने किसी व्यक्ति को इस तरह की अनुमति दी है।
एम्स में इलाज और लाइफ सपोर्ट हटाने का आदेश
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि हरीश राणा को तुरंत अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया जाए। साथ ही अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिया गया कि सभी आवश्यक चिकित्सीय प्रक्रियाओं और निगरानी के साथ उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया संवेदनशीलता और चिकित्सा मानकों के अनुरूप की जानी चाहिए।
क्या होता है पैसिव यूथेनेशिया?
पैसिव यूथेनेशिया का मतलब होता है किसी गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति के जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाली मशीनों या उपचार को हटाना।
इसमें किसी व्यक्ति को सीधे मौत देने की कार्रवाई नहीं होती, बल्कि जीवन रक्षक सहायता को बंद कर दिया जाता है ताकि मरीज प्राकृतिक रूप से जीवन का अंत कर सके। भारत में यह मुद्दा लंबे समय से कानूनी और नैतिक बहस का विषय रहा है।
कानून, करुणा और गरिमा के बीच संतुलन
हरीश राणा का मामला केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस जटिल सवाल को भी सामने लाता है जिसमें कानून, चिकित्सा विज्ञान और मानवीय संवेदना एक साथ जुड़ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा सकता है।

