रमज़ान में रोज़ा रखने वालों को काम में रियायत दे सरकार: अबू आज़मी
खुशबू खातून
महाराष्ट्र की राजनीति में रमज़ान को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। अबू आज़मी, जो कि समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, ने रमज़ान के पवित्र महीने में मुस्लिम कर्मचारियों को विशेष रियायत देने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि रोज़ा रखने वाले लोगों को दफ्तरों और कार्यस्थलों पर समय में छूट मिलनी चाहिए, ताकि वे धार्मिक कर्तव्यों का सही तरीके से पालन कर सकें।
मुंबई में मीडिया से बातचीत के दौरान अबू आज़मी ने कहा कि रमज़ान मुस्लिम समुदाय के लिए बेहद अहम महीना होता है। इस दौरान रोज़ा रखना, नमाज़ पढ़ना और इबादत करना धार्मिक रूप से आवश्यक माना जाता है। ऐसे में रोज़ा रखने वाले कर्मचारियों पर काम का अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि रमज़ान के दौरान कार्यालयों में कार्य समय शाम 4 बजे तक सीमित किया जा सकता है, जिससे लोग समय पर इफ्तार कर सकें।
अबू आज़मी ने यह भी बताया कि उन्होंने इस संबंध में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि सरकार मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इस पर गंभीरता से विचार करे। उनका कहना है कि देश के कई अन्य राज्यों में पहले से ही रमज़ान के दौरान इस तरह की छूट दी जाती रही है, ऐसे में महाराष्ट्र सरकार को भी इस दिशा में कदम उठाना चाहिए।
सपा नेता ने यह स्पष्ट किया कि यह मांग किसी विशेष वर्ग को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं है, बल्कि यह धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक समरसता को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक पहल हो सकती है। उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां सभी धर्मों और समुदायों की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही अबू आज़मी ने आगामी विधानसभा सत्र का भी जिक्र किया और कहा कि सत्र के दौरान भी विधायकों और कर्मचारियों को कुछ हद तक समय की रियायत मिलनी चाहिए, ताकि वे रमज़ान के दौरान धार्मिक कर्तव्यों को निभा सकें।
हालांकि, इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं भी सामने आ सकती हैं। कुछ दल इसे धार्मिक आधार पर विशेष सुविधा देने का मुद्दा बना सकते हैं, जबकि समर्थकों का मानना है कि यह मांग पूरी तरह मानवीय और व्यावहारिक है।
फिलहाल अब यह देखना अहम होगा कि महाराष्ट्र सरकार अबू आज़मी की इस मांग पर क्या रुख अपनाती है और क्या रमज़ान के दौरान कार्य समय में किसी तरह की रियायत देने का कोई फैसला लिया जाता है या नहीं।
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