हिमायतसागर-उस्मानसागर प्रदूषण पर सख्त हुआ तेलंगाना हाईकोर्ट, चार हफ्ते में रिपोर्ट मांगी
मुख्य न्यायाधीश Aparesh Kumar Singh और न्यायमूर्ति G M Mohiuddin की पीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संबंधित एजेंसियों को निर्देश दिया कि वे सीवेज ट्रीटमेंट, औद्योगिक अपशिष्ट रोकने और पर्यावरण मानकों के पालन से जुड़े उपायों की पूरी जानकारी दें। यह मामला MANUU के अध्ययन में पानी की गुणवत्ता खराब पाए जाने के बाद सामने आया है।
नवीदुल हसन
हिमायतसागर और उस्मानसागर में प्रदूषण रोकने के कदम बताएं: तेलंगाना हाईकोर्ट
Telangana High Court ने राज्य के कई विभागों को नोटिस जारी कर चार हफ्तों के भीतर यह बताने को कहा है कि हैदराबाद को पेयजल सप्लाई करने वाले हिमायतसागर और उस्मानसागर जलाशयों में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए हैं।
मुख्य न्यायाधीश Aparesh Kumar Singh और न्यायमूर्ति G M Mohiuddin की पीठ एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर दर्ज की गई थी, जिसमें दोनों जलाशयों के पानी की गुणवत्ता खराब होने की बात कही गई थी। मामले की अगली सुनवाई 26 मार्च 2026 को होगी।
अदालत ने तेलंगाना सरकार के मुख्य सचिव, नगर प्रशासन और सिंचाई विभाग के प्रधान सचिव, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जीएचएमसी, एचएमडीए, एचएमडब्ल्यूएसएसबी के आयुक्त और Maulana Azad National Urdu University (MANUU) के रजिस्ट्रार को नोटिस जारी किया है।
कोर्ट ने सभी संबंधित विभागों को निर्देश दिया कि वे विस्तृत हलफनामा दाखिल कर बताएं कि झीलों को प्रदूषण से बचाने के लिए क्या उपाय किए गए हैं। इसमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाने, गंदे पानी के शोधन, सीवेज के सीधे प्रवाह को रोकने, औद्योगिक अपशिष्ट और कृषि से बहकर आने वाले रसायनों को नियंत्रित करने जैसे कदम शामिल हैं।
यह मामला MANUU के दो प्रोफेसरों और एक शोध छात्र द्वारा किए गए अध्ययन के बाद सामने आया। अध्ययन में पाया गया कि दोनों जलाशयों का पानी भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के मानकों के अनुसार पीने योग्य नहीं है। उस्मानसागर के पानी में भारी धातुएं और फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए, जिससे माइक्रोबियल प्रदूषण की पुष्टि हुई। वहीं हिमायतसागर में आसपास के गांवों का बिना शोधन वाला सीवेज, औद्योगिक कचरा और कृषि अपशिष्ट मिलने की बात सामने आई।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पिछले कुछ वर्षों में पानी की गुणवत्ता लगातार गिर रही है। जैविक प्रदूषण बढ़ने से झीलों में शैवाल (एल्गी) की अधिकता, घुलित ऑक्सीजन में कमी और हानिकारक एल्गल ब्लूम की स्थिति बन रही है, जिससे जलीय जीवों को खतरा है।
अदालत ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित सभी नियामक एजेंसियां यह स्पष्ट करें कि पर्यावरण मानकों का पालन सुनिश्चित करने और झीलों की हालत बिगड़ने से रोकने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए हैं। साथ ही जीएचएमसी और नगर प्रशासन विभाग को विशेष रूप से निर्देश दिया गया है कि वे झीलों में बिना शोधन वाले कचरे और गंदे पानी के प्रवेश को रोकने के उपायों की जानकारी दें।
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