मिर्ज़ा ग़ालिब: शायरी का अमर सूरज, जो हर दौर को रोशन करता है

Dec 27, 2025 - 08:44
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मिर्ज़ा ग़ालिब: शायरी का अमर सूरज, जो हर दौर को रोशन करता है

उफ़क साहिल

उर्दू और फ़ारसी साहित्य के आकाश में मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब वह चमकता हुआ सूरज हैं, जिनकी रोशनी दो सदियों बाद भी फीकी नहीं पड़ी। जयंती से लेकर पुण्यतिथि तक, हर साल उनका नाम साहित्यिक चर्चाओं, सांस्कृतिक मंचों और मीडिया में विशेष रूप से गूंजता है।

27 दिसंबर: जयंती नहीं, विचारों का पुनर्जन्म

हर साल 27 दिसंबर को ग़ालिब की जयंती महज़ एक स्मृति-दिवस नहीं रहती, बल्कि विचारों के पुनर्पाठ का अवसर बन जाती है। देश-विदेश में साहित्यिक मंचों, विश्वविद्यालयों और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स पर ग़ालिब की ग़ज़लों और ख़तों को नए संदर्भों में पढ़ा-सुना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि युवा पीढ़ी ग़ालिब को प्रेम के शायर से आगे, एक प्रश्नकर्ता और आत्मसंघर्ष के कवि के रूप में पहचान रही है।

15 फरवरी: पुण्यतिथि पर दर्शन की चर्चा

ग़ालिब की पुण्यतिथि पर होने वाली चर्चाओं में यह स्पष्ट होता है कि उनकी शायरी भावुकता से कहीं आगे जाकर जीवन, मृत्यु, ईश्वर और अस्तित्व जैसे मूल प्रश्नों से टकराती है।

उनके शेर पाठक को उत्तर नहीं देते, बल्कि सोचने की आदत डालते हैं — और यही उनकी सबसे बड़ी विरासत मानी जाती है।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर ग़ालिब की वापसी

रील्स, पॉडकास्ट, थिएटर परफ़ॉर्मेंस और ओपन माइक सेशन में ग़ालिब की मौजूदगी यह साबित करती है कि शास्त्रीय साहित्य भी नए माध्यमों में नई जान पा सकता है।

उनकी भाषा का व्यंग्य, आत्मालोचन और बौद्धिक गहराई आज के डिजिटल दर्शक को भी बाँधने में सक्षम है।

ख़तों का महत्व: शायरी से आगे का ग़ालिब

साहित्यकारों के अनुसार, ग़ालिब के ख़त आधुनिक उर्दू गद्य की दिशा तय करते हैं। इनमें मौजूद सादगी, हास्य और आत्मीयता उन्हें एक संवेदनशील लेखक के रूप में स्थापित करती है, जो अपने समय को बारीकी से देख और समझ रहा था।

सीमाओं से मुक्त साहित्य

भारत, पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि यूरोप और मध्य-पूर्व के अकादमिक संस्थानों में भी ग़ालिब पर निरंतर शोध हो रहा है। अनुवादों और पाठ्यक्रमों के ज़रिए उनकी रचनाएँ यह संदेश देती हैं कि साहित्य की कोई सीमा नहीं होती

मिर्ज़ा ग़ालिब को केवल इतिहास में दर्ज करना उनके साथ अन्याय होगा। वे आज के इंसान के भीतर चल रही उलझनों, सवालों और संवादों की आवाज़ हैं।

ग़ालिब पढ़े नहीं जाते — महसूस किए जाते हैं। और शायद इसी कारण वे हर दौर में नए लगते हैं।

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