यूजीसी का नया क़ानून: बैकवर्ड वोट साधने की कोशिश में बीजेपी?
यूजीसी के प्रस्तावित नए क़ानून को लेकर राजनीतिक विवाद तेज़ हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी शिक्षा सुधार के बहाने पिछड़े वर्गों के वोट साधने की कोशिश कर रही है, जबकि सरकार का दावा है कि यह क़ानून समावेशी और पारदर्शी उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए लाया गया है।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए क़ानून को लेकर सियासी बहस तेज़ हो गई है। विपक्षी दलों और शिक्षा विशेषज्ञों का आरोप है कि यह क़ानून शिक्षा सुधार से ज़्यादा राजनीतिक लाभ, खासकर पिछड़े वर्ग (Backward Classes) के वोटों को साधने की रणनीति का हिस्सा है।
नए क़ानून के तहत उच्च शिक्षा संस्थानों की संरचना, नियुक्ति प्रक्रिया और नियामक व्यवस्था में बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी और वंचित वर्गों को अधिक अवसर मिलेंगे। वहीं आलोचकों का कहना है कि क़ानून में ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिन्हें सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीतिक संदेश देने के लिए पेश किया जा रहा है।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र का उपयोग चुनावी गणित साधने के लिए कर रही है। उनका कहना है कि अगर सरकार वास्तव में पिछड़े वर्गों के हित में गंभीर है, तो उसे विश्वविद्यालयों में खाली पदों को भरने, छात्रवृत्ति बढ़ाने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।
शिक्षाविदों का मानना है कि यूजीसी जैसे संस्थानों की स्वायत्तता से किसी भी तरह का समझौता उच्च शिक्षा के लिए नुकसानदेह हो सकता है। उनका कहना है कि सुधार ज़रूरी हैं, लेकिन वे व्यापक चर्चा और सहमति के साथ होने चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से।
हालांकि, बीजेपी का कहना है कि नया यूजीसी क़ानून समावेशी शिक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है और इससे पिछड़े व वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने में मदद मिलेगी। सरकार ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि क़ानून का उद्देश्य केवल शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाना है।
यूजीसी के नए क़ानून को लेकर संसद से लेकर सड़कों तक बहस जारी है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से और गरमाने की संभावना है।
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