भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारों व इन्फ्लुएंसर्स पर हमले (2025 रिपोर्ट के अनुसार)
रेहान फ़ज़ल
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जिसे आम भाषा में Free Speech कहा जाता है, संविधान के Article 19(1)(a) के तहत हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर व्यक्ति अपनी राय व्यक्त कर सके, समाचार साझा कर सके, और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर बातचीत कर सके। हालाँकि, 2025 में आए Free Speech Collective की रिपोर्ट इस आदर्श स्थिति से काफी भिन्न वास्तविकता उजागर करती है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में भारत में लगभग 14,875 मामले दर्ज किए गए, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन हुआ। इन घटनाओं में पत्रकारों और इन्फ्लुएंसर्स पर सीधे हमले, धमकियाँ, कानूनी कार्रवाई और ऑनलाइन सेंसरशिप शामिल थी।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि 117 गिरफ्तारी हुईं, जिनमें 8 पत्रकार भी शामिल थे। इसके अलावा, 8 पत्रकार और 1 सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की हत्या जैसी गंभीर घटनाएँ हुईं। पत्रकारों पर हुए हमलों में राज्यवार असमानता देखी गई, जैसे उत्तर प्रदेश में दो पत्रकारों की हत्या हुई, अंडमान निकोबार में एक, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक, ओडिशा और उत्तराखंड में भी पत्रकारों को निशाना बनाया गया। यह स्पष्ट करता है कि पत्रकार केवल अपनी जिम्मेदारी निभाने और भ्रष्टाचार या प्रशासनिक गड़बड़ी की रिपोर्टिंग करने के लिए खतरे में हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ के पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या उसी investigative रिपोर्टिंग के सिलसिले में हुई, जिसमें उन्होंने सड़क निर्माण परियोजनाओं में अनियमितताओं को उजागर किया था।
सिर्फ हिंसक हमलों तक ही मामला सीमित नहीं है। रिपोर्ट में कानूनी दबाव और “lawfare” के उदाहरण भी शामिल हैं, जिनके तहत पत्रकारों और नागरिकों को लंबी हिरासत में रखा गया। कुछ मामलों में Unlawful Activities Prevention Act (UAPA) का प्रयोग किया गया, जिससे पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अपने काम में बाधित हुए। इसके अलावा, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव बना। लगभग 3,070 इंटरनेट नियंत्रण और ऐप ब्लॉकिंग के मामले रिपोर्ट किए गए। भारत सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को हजारों खातों को हटाने का आदेश दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आलोचनात्मक या असहमति व्यक्त करने वाले लोगों की आवाज़ ऑनलाइन भी दबाई जा रही है।
इसी समय, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लिए भी नियम स्पष्ट हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी इन्फ्लुएंसर का कंटेंट हमेशा Free Speech की सुरक्षा में नहीं आता, खासकर जब वह कमाई या समुदाय को अपमानित करने वाले कथन के साथ जुड़ा हो। कई मामलों में इन्फ्लुएंसर्स को सार्वजनिक माफी देने का आदेश भी दिया गया। इसका मतलब यह है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ जिम्मेदारी और हानि के आकलन को भी महत्व दिया जाता है।
वैश्विक स्तर पर भी प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति चिंताजनक है। Reporters Without Borders के अनुसार, दुनिया भर में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर बढ़ते दबाव और सेंसरशिप के कारण प्रेस की स्वतंत्रता लगातार घट रही है। भारत का हाल, इस वैश्विक प्रवृत्ति के अनुरूप, इस तथ्य को रेखांकित करता है कि केवल कानूनी रूप से अधिकार होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे सुरक्षित वातावरण में लागू करना भी आवश्यक है।
2025 के आंकड़े और घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल संवैधानिक शब्दों में मौजूद है। वास्तविकता में पत्रकारों और नागरिकों के लिए स्वतंत्र रूप से बोलना और जानकारी साझा करना चुनौतीपूर्ण हो गया है। हिंसा, गिरफ्तारी, सेंसरशिप और कानूनी दबाव ने एक ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें लोग बिना डर के अपनी राय व्यक्त नहीं कर पाते। यही कारण है कि Free Speech अब केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित रखने और उसका सही प्रयोग सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष बन गया है।
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