बिहार एनडीए में अंदरूनी सियासत तेज, विधायकों की संख्या बढ़ाने की होड़ क्यों?
उफ़क साहिल
बिहार में विधानसभा चुनाव के बाद एनडीए को स्पष्ट और मजबूत जनादेश मिला, लेकिन सत्ता के गलियारों में सियासी हलचल थमी नहीं है। गठबंधन की दो धुरी—भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड)—अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को और मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही हैं।
कांग्रेस के 6 विधायकों का एनडीए खेमे में शामिल होना केवल गणितीय बढ़त नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन को साधने की एक अहम कोशिश माना जा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए यह कवायद सरकार चलाने से ज्यादा, भविष्य की राजनीति में अपनी निर्णायक भूमिका बनाए रखने से जुड़ी है। जेडीयू की संख्या बढ़ने से न सिर्फ सदन में उसकी स्थिति मजबूत होती है, बल्कि गठबंधन के भीतर बातचीत की ताकत भी बढ़ती है।
दूसरी ओर बीजेपी भी बिहार में खुद को केवल बड़े सहयोगी के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नेतृत्वकर्ता के तौर पर स्थापित करना चाहती है। पार्टी का फोकस संगठन विस्तार, विधायी मजबूती और भविष्य के सत्ता समीकरणों पर है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि दोनों दल अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हों।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब सरकार के पास पर्याप्त बहुमत हो, तब विधायकों को जोड़ने की कोशिश सत्ता बचाने के लिए नहीं, बल्कि सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए होती है। यह प्रतिस्पर्धा दरअसल बिहार एनडीए के भीतर नेतृत्व, प्रभाव और आने वाले वर्षों की राजनीति की दिशा तय करने की है।
कुल मिलाकर, कांग्रेस विधायकों पर टिकी निगाहें बिहार की उस सियासत की ओर इशारा कर रही हैं, जहां गठबंधन के भीतर भी शक्ति संतुलन लगातार नए सिरे से गढ़ा जा रहा है।
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