आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, मानव सुरक्षा और पशु कल्याण पर तीखी बहस
सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के मामले पर सुनवाई के दौरान मानव सुरक्षा और पशु अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर बहस हुई। कोर्ट के 7 नवंबर के आदेश, नसबंदी और टीकाकरण नीति, शेल्टर की कमी और कुत्तों को वापस उसी इलाके में छोड़ने जैसे मुद्दों पर वरिष्ठ वकीलों ने अपनी दलीलें रखीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।
नवीदुल हसन
आवारा कुत्तों का मामला: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, मानव सुरक्षा और पशु कल्याण पर बहस
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 7 जनवरी 2026 को आवारा कुत्तों से जुड़े मामले की सुनवाई की। यह सुनवाई सुबह 10:30 बजे शुरू हुई। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ कर रही है।
इससे पहले तय सुनवाई रद्द हो गई थी। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जल्द सुनवाई की मांग करते हुए कहा था कि ज़मीनी स्तर पर कुत्तों के साथ बहुत अमानवीय व्यवहार हो रहा है। इस पर न्यायमूर्ति मेहता ने कहा था कि अगली सुनवाई में वीडियो दिखाकर पूछा जाएगा कि “मानवता क्या है।”
7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि स्कूलों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन जैसे संस्थानों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए। कोर्ट ने कहा था कि कुत्तों को नसबंदी (स्टेरिलाइजेशन) और टीकाकरण के बाद तय शेल्टर में भेजा जाए और उन्हें उसी जगह वापस न छोड़ा जाए।
सुनवाई के दौरान अलग-अलग वकीलों और सामाजिक संगठनों ने अपनी दलीलें रखीं।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि मानव सुरक्षा सबसे जरूरी है, लेकिन कुत्तों को मारना या अचानक हटाना समाधान नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर 70 प्रतिशत कुत्तों का टीकाकरण हो जाए तो 2–3 साल में रेबीज पर काबू पाया जा सकता है।
वरिष्ठ वकील के. के. वेणुगोपाल ने बताया कि देश में करीब 5 करोड़ से ज्यादा आवारा कुत्ते हैं और उन्हें रखने के लिए जरूरी शेल्टर और संसाधन मौजूद नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इतने बड़े स्तर पर व्यवस्था करना सरकार के लिए बेहद मुश्किल है।
कई वकीलों और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा कि अगर नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को उनके इलाके में वापस नहीं छोड़ा गया, तो वहां नए और बिना टीकाकरण वाले कुत्ते आ जाएंगे। इससे काटने की घटनाएं और बढ़ सकती हैं, जिसे “वैक्यूम इफेक्ट” कहा जाता है।
वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि आवारा कुत्ते संवेदनशील जीव हैं और उनके साथ क्रूरता की घटनाएं बढ़ रही हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि दिल्ली में हाल के वर्षों में रेबीज के मामले शून्य रहे हैं।
कुछ याचिकाकर्ताओं ने मानव सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही। एक वकील ने कुत्तों के हमले में मारे गए व्यक्ति की तस्वीर दिखाने की कोशिश की, जिस पर अदालत ने फोटो हटाने को कहा और दलील तक सीमित रहने को कहा।
न्यायमूर्ति मेहता ने सवाल उठाया कि स्कूलों, अदालतों और अन्य संस्थानों में कुत्तों की जरूरत क्यों है। वहीं, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया जाएगा और वीडियो दिखाने की जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की सुनवाई कल भी जारी रहेगी। कोर्ट इस बात पर विचार कर रही है कि मानव सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
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