गाज़ा के लिए शांति बोर्ड: ट्रंप ने भारत को किया आमंत्रित, वैश्विक स्तर पर मंथन तेज
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाज़ा में शांति, प्रशासन और पुनर्निर्माण की देखरेख के लिए गठित “बोर्ड ऑफ पीस” में भारत को शामिल होने का निमंत्रण दिया है। इस बोर्ड में मुख्य बोर्ड, फिलिस्तीनी तकनीकी समिति और एक एग्जीक्यूटिव बोर्ड शामिल होंगे। भारत को इज़राइल और फिलिस्तीन—दोनों के साथ ऐतिहासिक संबंधों और मानवीय सहायता के चलते अहम भूमिका के लिए उपयुक्त माना जा रहा है। हालांकि, कई देशों ने इस पहल को लेकर सतर्क रुख अपनाया है और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
नवीदुल हसन
गाज़ा के लिए “शांति बोर्ड”: ट्रंप ने भारत को किया आमंत्रित, कई देशों ने जताई चिंता
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध से तबाह गाज़ा पट्टी के पुनर्निर्माण और वहां शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए बनाए गए “बोर्ड ऑफ पीस” यानी शांति बोर्ड में भारत को शामिल होने का निमंत्रण दिया है। सूत्रों के अनुसार, यह बोर्ड गाज़ा में शांति बहाली, प्रशासन और विकास कार्यों की निगरानी करेगा।
व्हाइट हाउस ने बताया कि यह व्यवस्था तीन स्तरों पर काम करेगी। सबसे ऊपर मुख्य बोर्ड होगा, जिसकी अध्यक्षता खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करेंगे। इसके अलावा एक फिलिस्तीनी तकनीकी समिति बनाई जाएगी, जिसमें विशेषज्ञ और प्रशासक शामिल होंगे, जो गाज़ा के रोज़मर्रा के प्रशासन को संभालेंगे। तीसरा हिस्सा एग्जीक्यूटिव बोर्ड होगा, जिसकी भूमिका सलाह देने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने की होगी।
सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान को भी इस शांति बोर्ड में शामिल होने का न्योता दिया गया है। हालांकि, इज़राइल पहले ही साफ कर चुका है कि गाज़ा के भविष्य से जुड़े किसी भी ढांचे में पाकिस्तान की भागीदारी उसे मंज़ूर नहीं होगी। इज़राइल के भारत में राजदूत रयूवेन अज़ार ने एक साक्षात्कार में कहा था कि पाकिस्तान इज़राइल के लिए स्वीकार्य नहीं है।
भारत को इस बोर्ड में शामिल करने का प्रस्ताव इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि भारत के इज़राइल और फिलिस्तीन—दोनों के साथ ऐतिहासिक और संतुलित संबंध रहे हैं। भारत जहां इज़राइल का रणनीतिक साझेदार है, वहीं फिलिस्तीन को लंबे समय से मानवीय सहायता देता आ रहा है। हालिया संघर्ष के बाद भारत उन शुरुआती देशों में शामिल था, जिसने मिस्र के ज़रिये गाज़ा को राहत सामग्री और दवाइयाँ भेजीं।
यह “शांति बोर्ड” 15 जनवरी को ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना के तहत गठित किया गया है। इस योजना का उद्देश्य सिर्फ गाज़ा में शांति बहाल करना ही नहीं, बल्कि भविष्य में दुनिया के अन्य संघर्षग्रस्त इलाकों में भी इसी तरह के तंत्र को लागू करना बताया जा रहा है।
हालांकि, इस पहल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई देशों ने खुलकर समर्थन देने से परहेज़ किया है। राजनयिकों का कहना है कि ट्रंप की यह योजना संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका को कमजोर कर सकती है, क्योंकि अब तक वैश्विक संघर्षों के समाधान में UN की अहम भूमिका रही है।
अब तक केवल हंगरी ने इस पहल को बिना किसी शर्त के स्वीकार किया है। बताया गया है कि करीब 60 देशों को इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है, जो यूरोपीय देशों तक पहुंच चुका है। कई देशों की सरकारें फिलहाल इस पर चुप हैं और अंदरूनी तौर पर विचार-विमर्श कर रही हैं।
व्हाइट हाउस ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि बोर्ड के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारियाँ क्या होंगी। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में बोर्ड के और सदस्यों के नामों की घोषणा की जाएगी।
इधर, इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने एग्जीक्यूटिव बोर्ड की संरचना पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि बोर्ड का गठन इज़राइल से सलाह किए बिना किया गया है और इसमें कुछ ऐसे नाम शामिल हैं, जो इज़राइल की नीति के खिलाफ हैं। खासतौर पर तुर्की की भागीदारी और क़तर के साथ इज़राइल के तनावपूर्ण रिश्तों को लेकर चिंता जताई गई है।
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