देहरादून में त्रिपुरा के छात्र की हत्या से देशभर में आक्रोश, पिता बोले– “जो मेरे बेटे के साथ हुआ, वो किसी और के साथ न हो”
देहरादून में पढ़ाई कर रहे त्रिपुरा के 24 वर्षीय छात्र एंजेल चकमा की हमले के बाद मौत हो गई। इस घटना ने उत्तर भारत में पूर्वोत्तर के छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव और नस्लीय टिप्पणियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस ने पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जबकि एक आरोपी अब भी फरार है।
नवीदुल हसन
पढ़ाई के लिए आए छात्र की हत्या, देहरादून में एंजेल चकमा केस ने उठाए भेदभाव पर सवाल
देहरादून में पढ़ाई कर रहे त्रिपुरा के एक छात्र की हत्या के मामले ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। इस घटना ने एक बार फिर उत्तर भारत में पढ़ाई और नौकरी के लिए आने वाले पूर्वोत्तर भारत के छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव और नस्लीय टिप्पणियों की गंभीर समस्या को सामने ला दिया है।
त्रिपुरा के अगरतला जिले के नंदनगर इलाके के रहने वाले 24 वर्षीय एंजेल चकमा देहरादून की एक निजी यूनिवर्सिटी से एमबीए फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रहे थे। नौ दिसंबर 2025 को देहरादून के सेलाकुई थाना क्षेत्र के बाजार में उन पर कुछ युवकों ने हमला कर दिया। इस हमले में उन्हें सिर पर हाथ में पहने कड़े से मारा गया और पीठ के निचले हिस्से में चाकू घोंपा गया।
हमले के वक्त एंजेल के साथ उनके छोटे भाई माइकल चकमा भी मौजूद थे। माइकल ने बताया कि वह उस शाम अपने भाई और दो दोस्तों के साथ बाजार गए थे। बाजार में खड़ी एक मोटरसाइकिल हटाने के दौरान वहां मौजूद कुछ युवकों ने एंजेल पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करनी शुरू कर दीं।
माइकल के अनुसार, हमलावरों ने एंजेल को “चिंकी”, “चाइनीज़” और अन्य अपमानजनक शब्द कहे। शुरुआत में उन्होंने इन बातों को नजरअंदाज किया, लेकिन जब गालियां बढ़ने लगीं और विरोध किया गया, तो युवकों ने अचानक हमला कर दिया। माइकल ने बताया कि जब एंजेल उन्हें बचाने के लिए आगे आए, तो हमलावरों ने उन्हें जमीन पर गिराकर लात-घूंसे मारे और सिर पर कड़े से वार किया, जिससे वह बेहोश हो गए।
कुछ देर बाद जब माइकल को होश आया, तो उन्होंने अपने भाई को खून से लथपथ हालत में देखा। आनन-फानन में एंजेल को एंबुलेंस से पास के एक निजी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने बताया कि उनके सिर में गंभीर चोट थी और चाकू लगने के कारण उनकी हालत बेहद नाजुक थी।
एंजेल चकमा नौ दिसंबर से 26 दिसंबर तक अस्पताल में भर्ती रहे। करीब 16 दिन तक उन्होंने जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष किया, लेकिन आखिरकार 26 दिसंबर को उनकी मौत हो गई। 28 दिसंबर को त्रिपुरा के उनाकोटी जिले के उनके पैतृक गांव मचमरा में उनका अंतिम संस्कार किया गया।
एंजेल के पिता तरुण प्रसाद चकमा सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में हेड कांस्टेबल हैं और फिलहाल मणिपुर में तैनात हैं। बेटे की मौत से टूट चुके पिता ने कहा, “जो मेरे बच्चे के साथ हुआ, वो किसी और के बच्चे के साथ न हो। हमारे बच्चे पढ़ाई और नौकरी के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में जाते हैं। उनके साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए।”
उन्होंने सरकार से अपील करते हुए कहा कि पूर्वोत्तर के लोग भी उतने ही भारतीय हैं जितने देश के अन्य हिस्सों के नागरिक। सिर्फ चेहरे या भाषा के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।
इस मामले में पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी कई सवाल उठे हैं। माइकल चकमा का आरोप है कि घटना के अगले दिन जब वह थाने शिकायत दर्ज कराने पहुंचे, तो पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया। 12 दिसंबर को दर्ज एफआईआर में शुरुआत में हत्या की कोशिश की धारा नहीं जोड़ी गई, जबकि चाकू से हमला हुआ था।
एंजेल की मौत के बाद मामले में हत्या की धारा जोड़ी गई। देहरादून पुलिस के अनुसार, इस मामले में अब तक पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें दो नाबालिग शामिल हैं। नाबालिगों को बाल सुधार गृह भेज दिया गया है, जबकि तीन अन्य आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं। एक आरोपी अब भी फरार है, जिस पर 25 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है। आयोग ने उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक और देहरादून प्रशासन से जवाब तलब किया है और एफआईआर में देरी तथा निष्पक्ष जांच न होने पर चिंता जताई है।
एंजेल की हत्या के बाद देहरादून में रहने वाले पूर्वोत्तर भारत के छात्रों में डर का माहौल है। छात्र संगठनों का कहना है कि देहरादून में लगभग 500 पूर्वोत्तर छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, जिनमें से करीब 300 त्रिपुरा से हैं। छात्रों का कहना है कि वे अब खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं।
यूनिफाइड त्रिपुरा स्टूडेंट एसोसिएशन देहरादून के प्रतिनिधियों ने बताया कि नस्लीय भेदभाव सिर्फ देहरादून तक सीमित नहीं है, बल्कि दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में भी पूर्वोत्तर के लोगों को इसी तरह की टिप्पणियों और व्यवहार का सामना करना पड़ता है।
छात्रों का कहना है कि वे बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर घर से दूर आते हैं, लेकिन इस तरह की घटनाएं उनके और उनके परिवारों के मन में डर पैदा कर देती हैं। एंजेल चकमा की हत्या ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश के हर हिस्से में सभी नागरिक खुद को समान और सुरक्षित महसूस कर पा रहे हैं।
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