तेलंगाना सरकार बनाम MANUU: 50 एकड़ ज़मीन को लेकर सियासी और छात्र विरोध तेज

Jan 7, 2026 - 12:28
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तेलंगाना सरकार बनाम MANUU: 50 एकड़ ज़मीन को लेकर सियासी और छात्र विरोध तेज

अदनान आलम

हैदराबाद: तेलंगाना सरकार द्वारा मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) से 50 एकड़ ज़मीन वापस लेने की प्रक्रिया शुरू किए जाने के बाद यह मामला अब सियासी और शैक्षणिक हलकों में बड़े विवाद का रूप लेता जा रहा है। सरकार का कहना है कि संबंधित ज़मीन का उपयोग तय उद्देश्य के अनुसार नहीं किया गया, जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र संगठनों ने इस कदम को उच्च शिक्षा के भविष्य के लिए खतरा बताया है।

शो-कॉज नोटिस से बढ़ा विवाद

The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, रंगारेड्डी ज़िला कलेक्टर कार्यालय ने MANUU के रजिस्ट्रार इश्तियाक़ अहमद को शो-कॉज नोटिस जारी कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि मणिकोंडा गांव (गंडिपेट मंडल) के सर्वे नंबर 211 और 212 में स्थित खाली ज़मीन को सरकार द्वारा पुनः क्यों न लिया जाए। प्रशासन का तर्क है कि यह ज़मीन अब तक उस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं की गई, जिसके लिए इसे आवंटित किया गया था।

विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, खाली ज़मीन पर बुनियादी ढांचे के विकास, कॉलेज, शैक्षणिक ब्लॉक और अन्य सुविधाओं के प्रस्ताव मौजूद हैं। अधिकारी ने बताया कि MANUU की स्थापना 1998 में हुई थी और उसे 200 एकड़ ज़मीन आवंटित की गई थी। किसी भी विश्वविद्यालय के लिए इतनी बड़ी ज़मीन का पूर्ण उपयोग कुछ ही वर्षों में संभव नहीं होता, साथ ही यूजीसी के दिशा-निर्देशों का पालन भी आवश्यक होता है।

छात्र संगठनों की आपत्ति

MANUU के छात्रों के सामूहिक मंचों ने सरकार के इस कदम को चिंताजनक बताया है। छात्रों का कहना है कि ज़मीन भविष्य की शैक्षणिक आवश्यकताओं, हॉस्टल निर्माण और अकादमिक विस्तार के लिए आरक्षित है। खासतौर पर अल्पसंख्यक, हाशिए पर रहने वाले और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए बुनियादी सुविधाओं की पहले से ही कमी है।

सियासी घमासान: केटीआर और ओवैसी का हमला

जहां एक तरफ इस मुद्दे पर भारत राष्ट्र समिति (BRS) के नेता के. टी. रामाराव (केटीआर) ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि तेलंगाना में शिक्षा संस्थानों की ज़मीन को निशाना बनाया जा रहा है। केटीआर ने कहा कि विश्वविद्यालयों को मज़बूत करने के बजाय उन्हें कमज़ोर किया जा रहा है और BRS, MANUU के छात्रों के साथ इस फैसले का विरोध करेगी।

वहीं, AIMIM विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी ने विधानसभा में सरकार की नीति के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। ओवैसी ने कहा कि गच्चीबोली जैसे प्राइम इलाकों में स्थित शिक्षण संस्थानों की ज़मीन वापस लेना राज्य के शैक्षणिक भविष्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। उन्होंने सरकार से सवाल किया कि अगर विश्वविद्यालयों की ज़मीन वापस ले ली गई, तो उनके भविष्य के विस्तार की योजनाएं कैसे पूरी होंगी।

सरकार का पक्ष

रंगारेड्डी ज़िला कलेक्टर सी. नारायण रेड्डी ने बताया कि यह नोटिस 2024 में किए गए एक रूटीन ऑडिट का हिस्सा है, जिसमें राज्यभर की ‘अप्रयुक्त’ ज़मीनों की समीक्षा की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय से मिलने वाले जवाब को राज्य सरकार को भेजा जाएगा, जिसके बाद आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।

MANUU प्रशासन की ओर से सरकार को जल्द ही विस्तृत जवाब सौंपे जाने की संभावना है, जिसमें ज़मीन के प्रस्तावित उपयोग और भविष्य की विकास योजनाओं का उल्लेख होगा। फिलहाल यह मामला शिक्षा बनाम भूमि अधिग्रहण की बहस का केंद्र बन चुका है और आने वाले दिनों में इस पर सियासी और सामाजिक हलचल और तेज़ हो सकती है।

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