जामिया विश्वविद्यालय में परीक्षा प्रश्न को लेकर चर्चा, अकादमिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर मंथन
उफ़क साहिल
नई दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में बीए (ऑनर्स) सोशल वर्क प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा में पूछे गए एक प्रश्न को लेकर शैक्षणिक और सार्वजनिक विमर्श तेज हो गया है। “भारत में सामाजिक समस्याएं” विषय के प्रश्नपत्र में शामिल एक प्रश्न ने अकादमिक स्वतंत्रता, पाठ्यक्रम संतुलन और मूल्यांकन पद्धति को लेकर बहस को जन्म दिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रश्न की भाषा और विषयवस्तु पर कुछ समूहों ने आपत्ति जताई है। इसके बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ रिपोर्ट्स में संबंधित शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की बात कही गई है, हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
आलोचनात्मक प्रतिक्रिया देने वालों का मानना है कि परीक्षा प्रश्नों में विषयों को इस तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए कि वे बहु-आयामी और संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाएं। उनका कहना है कि किसी भी सामाजिक मुद्दे पर चर्चा करते समय व्यापक संदर्भ और विविध दृष्टियों को शामिल करना आवश्यक है।
वहीं, शिक्षाविदों और सामाजिक विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों का तर्क है कि सोशल वर्क जैसे विषयों में समाज की जमीनी वास्तविकताओं और संवेदनशील मुद्दों पर अध्ययन और विमर्श स्वाभाविक है। उनके अनुसार, इस तरह के प्रश्न छात्रों की सामाजिक समझ और विश्लेषण क्षमता को मजबूत करने में सहायक हो सकते हैं।
छात्र संगठनों की प्रतिक्रियाएं भी अलग-अलग रहीं। कुछ छात्रों ने मामले में स्पष्टता और पारदर्शिता की मांग की, जबकि अन्य ने शिक्षकों की शैक्षणिक स्वायत्तता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
यह घटनाक्रम एक बार फिर उच्च शिक्षण संस्थानों में अकादमिक स्वतंत्रता, पाठ्यक्रम निर्माण और सामाजिक दबावों के बीच संतुलन की जरूरत को रेखांकित करता है। विश्वविद्यालय की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया आने के बाद ही स्थिति को लेकर पूरी स्पष्टता सामने आ सकेगी।
What's Your Reaction?

