सऊदी-पाकिस्तान के ‘मुस्लिम NATO’ में अब तुर्किये की एंट्री, इस्लामिक देशों की रणनीतिक राजनीति में बड़ा बदलाव
खुशबू खातून
मध्य पूर्व और इस्लामिक देशों की राजनीति में एक बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के नेतृत्व में बनाए जा रहे तथाकथित ‘मुस्लिम NATO’ में अब तुर्किये की एंट्री होती दिख रही है। तुर्किये के इस गठजोड़ में शामिल होने से क्षेत्रीय समीकरणों पर गहरा असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, सऊदी अरब लंबे समय से इस्लामिक देशों के बीच एक साझा सैन्य और सुरक्षा मंच बनाने की दिशा में काम कर रहा है, जिसे अनौपचारिक रूप से ‘मुस्लिम NATO’ कहा जा रहा है। इस गठबंधन का उद्देश्य आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करना और क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करना बताया जा रहा है।
पाकिस्तान इस पहल में पहले से ही अहम भूमिका निभा रहा है। अब तुर्किये की भागीदारी से इस गठबंधन की सैन्य और कूटनीतिक ताकत में इजाफा माना जा रहा है। तुर्किये की सेना, रक्षा तकनीक और अंतरराष्ट्रीय अनुभव इस गठजोड़ को और प्रभावशाली बना सकता है।
वहीं, तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन की सक्रिय विदेश नीति इस घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बनाती है। तुर्किये पहले ही मुस्लिम देशों के मामलों में खुलकर भूमिका निभाता रहा है, चाहे वह फिलिस्तीन का मुद्दा हो या पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस नए गठबंधन से मध्य पूर्व की राजनीति में नए ध्रुव बन सकते हैं। साथ ही, इसका असर भारत, ईरान और पश्चिमी देशों के साथ इन देशों के संबंधों पर भी पड़ सकता है। भारत के संदर्भ में देखा जाए तो पाकिस्तान और तुर्किये पहले से ही कश्मीर मुद्दे पर भारत-विरोधी रुख अपनाते रहे हैं, ऐसे में यह गठजोड़ नई कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
हालांकि, अभी तक ‘मुस्लिम NATO’ को लेकर कोई आधिकारिक ढांचा या औपचारिक घोषणा सामने नहीं आई है। लेकिन हालिया कूटनीतिक गतिविधियां और बैठकों से संकेत मिल रहे हैं कि इस दिशा में प्रयास तेज हो गए हैं।
कुल मिलाकर, तुर्किये की संभावित एंट्री से सऊदी अरब और पाकिस्तान के इस रणनीतिक गठबंधन को नई धार मिल सकती है, जिसका असर आने वाले समय में वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीति पर साफ तौर पर देखने को मिल सकता है।
What's Your Reaction?

