मिट्टी में मिला था ‘अशोक स्तंभ’, नेहरू–पटेल ने इसे ही क्यों बनाया देश की शान; कैसे तय हुए थे नाम, नोट और राष्ट्रीय प्रतीक?
26 जनवरी 1950 को भारत के गणतंत्र बनने के साथ ही देश की पहचान से जुड़े ब्रिटिश राज के सभी प्रतीकों को हटाकर नए राष्ट्रीय प्रतीकों को अपनाया गया। सेना से ‘रॉयल’ शब्द हटाया गया, नोटों से महारानी की तस्वीर हटाई गई और अशोक स्तंभ को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया। सरकारी मुहरों, दस्तावेजों, वर्दियों और ध्वज में भी व्यापक बदलाव हुए, जिससे स्वतंत्र भारत की नई पहचान स्थापित हुई।
शेख अर्शी
26 जनवरी 1950 को भारत के गणतंत्र बनते ही ब्रिटिश राज के प्रतीक इतिहास बन गए। सेना से ‘रॉयल’ शब्द हटा दिया गया, नोटों से महारानी की तस्वीर गायब हुई और अशोक स्तंभ को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया। जानिए राष्ट्रीय प्रतीक कैसे बदले गए?
26 जनवरी 1950 की सुबह कोई आम सुबह नहीं थी। आसमान में कोहरा छाया था, हवा भी सर्द थी, लेकिन उसी दिन इतिहास के पन्नों पर भारत का सुनहरा ‘सूर्योदय’ दर्ज हुआ। आज़ादी के ठीक 2 साल 5 महीने 11 दिन बाद उस सुबह सिर्फ संविधान ही लागू नहीं हुआ था, बल्कि देश की पहचान से जुड़े नाम, नोट, मुहर, ध्वज और प्रतीक भी बदल गए थे।
उस दिन सरकारी दफ्तरों और अदालतों की मुहरों से ब्रिटिश राज का ठप्पा मिटा दिया गया। सेना के नाम से ‘रॉयल’ शब्द हटाया गया। वर्दियों से ब्रिटिश क्राउन उतार दिया गया।
नोटों पर छपी महारानी की तस्वीर इतिहास बन गई। ‘By Order of His Majesty the King…’ वाले लेटरहेड अब किसी काम के नहीं रहे। ‘God Save the Queen’ के गीत भी धीरे-धीरे भुला दिए गए।
State Emblem inside
धीरे-धीरे भारतीय सेना की वर्दी, सरकारी दस्तावेजों, मुहरों और नोटों पर अशोक स्तंभ चमकने लगा। ब्रिटिश झंडे यूनियन जैक की जगह देशभर में तिरंगा लहराने लगा। लेटरहेड पर पहली बार ‘Government of India’ लिखा गया। राष्ट्रगान के रूप में ‘जन गण मन’ और राष्ट्रगीत के रूप में ‘वंदे मातरम्’ को अपनाया गया।
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