JNU नारेबाज़ी पर FIR, लेकिन सवाल बाकी—आग किसने लगाई, ज़िम्मेदारी कौन लेगा? सरकार और प्रशासन कटघरे में
रेहान फ़ज़ल
दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) एक बार फिर सियासी टकराव का मैदान बन गई है। विवादित नारेबाज़ी के मामले में FIR दर्ज कर दी गई है और यूनिवर्सिटी प्रशासन ने शामिल छात्रों पर सख़्त कार्रवाई का एलान किया है। लेकिन असली सवाल यह है—क्या FIR दर्ज करना ही पर्याप्त है, या यह सिर्फ़ आग बुझाने का दिखावा?
प्रशासन का कहना है कि नारेबाज़ी में शामिल छात्रों को सस्पेंड किया जाएगा और “नफ़रत फैलाने” वालों पर कार्रवाई होगी। पर सवाल उठता है कि ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों होती हैं? कैंपस में तनाव का माहौल बनने से पहले रोकथाम क्यों नहीं हुई? सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी किसके ज़िम्मे थी?
सरकार पर भी सवाल बनता है। क्या शिक्षा संस्थानों को राजनीतिक अखाड़ा बनने से रोकने के लिए कोई ठोस नीति है, या हर बार घटना के बाद कार्रवाई का एलान ही अंतिम जवाब है? अभिव्यक्ति की आज़ादी और क़ानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की ज़िम्मेदारी किसकी है?
JNU प्रशासन ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाने वालों पर कड़ी कार्रवाई की बात कही है, लेकिन पारदर्शिता कब आएगी—कार्रवाई की प्रक्रिया क्या होगी, और क्या यह निष्पक्ष होगी?
कैंपस को ज्ञान और बहस का केंद्र होना चाहिए, न कि आगज़नी और नारेबाज़ी का। FIR के साथ-साथ सरकार और यूनिवर्सिटी प्रशासन को यह भी बताना होगा कि भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए वे क्या ठोस कदम उठा रहे हैं—वरना हर बार वही सवाल, वही बयान और वही विवाद दोहराए जाते रहेंगे।
What's Your Reaction?

