हर घर में कुम्हार, सैकड़ों साल पुरानी परंपरा वाला कुंभरापाड़ा गांव
ओडिसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर में लाखों नहीं बल्कि करोडो की आस्था है। क्या आपको पता है इस मंदिर में हर दिन महाप्रसाद बनाने और परोसने के लिए किन चीज़ों का इस्तेमाल किया जाता है ? अगर आपको नहीं पता है तो फिर हम आपको यह बताते हैं कि महाप्रसाद परोसने के लिए हजारों मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल होता है।
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ओडिसा: ओडिसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर में लाखों नहीं बल्कि करोडो की आस्था है। क्या आपको पता है इस मंदिर में हर दिन महाप्रसाद बनाने और परोसने के लिए किन चीज़ों का इस्तेमाल किया जाता है ? अगर आपको नहीं पता है तो फिर हम आपको यह बताते हैं कि महाप्रसाद परोसने के लिए हजारों मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल होता है। चलिए साथ साथ आपको यह भी बता दें कि ये सभी बर्तन कहाँ से एते हैं तो आपको यह जान कर बहुत हु आश्चर्य होगा कि यह सभी बर्तन पुरी के कुंभारपाड़ा इलाके में रहने वाले कुम्हार परिवार जो पीढ़ी दर पीढ़ी बनाते आ रहे हैं।
जैसा कि कुंभारपाड़ा के नाम से ही पता चल रहा होगा कि यह कुम्हारों से जुडी जगह के बारे में बात हो रही है। सदियों से जगन्नाथ मंदिर के साथ जुड़े होने की वजह से कुंभारपाड़ा के करीब 400 कुम्हार परिवार चाहते हैं कि अब उनके गांव को ‘हेरिटेज विलेज’ घोषित किया जाए और इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए, ताकि लोग उनके काम को देख सकें और उनके द्वारा किये जा रहे इस काम की विश्व में पहचान मिल सके।
जगन्नाथ मंदिर, पुरी
जगन्नाथ मंदिर में चढ़ने वाला हर महाप्रसाद मिट्टी के बर्तनों में ही पकाया जाता है। माना जाता है कि छप्पन भोग की परंपरा में मिट्टी के बर्तन का खास महत्व है। कुंभारपाड़ा के कुम्हार सैकड़ों सालों से भगवान जगन्नाथ की सेवा कर रहे हैं। यहां लगभग हर घर में चाक पर मिटटी के बर्तन बनाने का काम किया जाता है।
तो चलिए अब आपको कुंभारपाड़ा का सैर कराते हैं
ओडिसा के पुरी शहर में अथरनाला से जेल रोड से होते हुए बड़ा डांडा जाने पर एक छोटा सा गांव कुंभारपाड़ा है। इस गांव में तक़रीबन 200 कुम्हार परिवार रहते हैं। अगर आसपास के इलाकों में मौजूद कुम्हारों को मिला लिया जाए तो इन सभी कुम्हारों की संख्या 400 से ज्यादा हो जाती है। ये सभी परिवार पीढ़ियों से मंदिर के लिए मिट्टी के बर्तन बनाते आ रहे हैं।
इस गांव की एपीआई एक इतिहासिक मान्यता है
ऐसा मना जाता है कि कुंभारपाड़ा गांव का इतिहास 13वीं सदी से जुड़ा है। जब महाप्रसाद बनाने की परंपरा की शुरुआत हुई थी तब उत्तर प्रदेश के कानपुर से कुम्हारों को पुरी लाया गया था, जो यहीं बस गए और तब से भगवान की सेवा कर रहे हैं।
एक दिलचस्प बात यह है कि कुंभारपाड़ा के ही पास मौजूद रघुराजपुर गांव को हेरिटेज विलेज का दर्जा मिल चुका है, लेकिन कुंभारपाड़ा आज भी इस सम्मान का इंतजार कर रहा है। लेकिन इस गांव के कुम्हारों को पूरा विश्वास है कि उनके गांव को बहुत जल्द ही हेरिटेज विलेज का दर्जा मिल जायेगा।
कुम्हारों की अपनी पेशानी है
बदलते समय के साथ कुम्हारों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। मिट्टी और लकड़ी की कीमतों में बेशुमार उछाल से यहाँ के कुम्हार काफी परेशां हैं। उनका कहना है की पिछले दस सालों में मिटटी और लकड़ी की कीमतों में बेतहाशा इज़ाफ़ा हुआ है, यही कारण है कि अब नई पीढ़ी इस काम से दूर होती जा रही है। ऐसे में कुम्हार चाहते हैं कि सरकार उनके गांव को हेरिटेज विलेज घोषित करे, ताकि उनकी परंपरा और आजीविका दोनों बच सकें।
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