ere | Source: ereमहाराष्ट्र। कुछ सपने ऐसे होते हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए इंसान अपनी पूरी जिंदगी लगा देता है। महाराष्ट्र के वर्धा जिले के प्रज्वल समरित की कहानी भी ऐसी ही है, जिन्होंने अपने शहीद पिता के अधूरे सपने को पूरा करने के लिए शानदार करियर के दो बड़े अवसर तक ठुकरा दिए। कारगिल युद्ध में पिता की शहादत के बाद जन्मे प्रज्वल ने उन्हें कभी देखा नहीं, लेकिन उनके देशसेवा के जज्बे को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया। CAT परीक्षा में 97.51 पर्सेंटाइल हासिल करने के बाद उन्हें IIM इंदौर और IIM कोझिकोड से दाखिले का प्रस्ताव मिला, लेकिन उन्होंने दोनों को ठुकराकर भारतीय सेना की वर्दी पहनने का फैसला किया। लगातार आठ बार असफल होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और नौवें प्रयास में सेना में अधिकारी बनने का सपना पूरा कर दिखाया।

कारगिल युद्ध में शहीद हुए पिता, बेटे ने बचपन में ही बना लिया था लक्ष्य

प्रज्वल समरित महाराष्ट्र के वर्धा जिले की पुलगांव तहसील के रहने वाले हैं। उनके पिता लांस नायक कृष्णाजी समरित वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे। पिता की शहादत के समय प्रज्वल ने जन्म भी नहीं लिया था। इसलिए उन्हें कभी पिता का स्नेह और साथ नसीब नहीं हुआ।

हालांकि, परिवार में पिता की बहादुरी और सेना में उनकी सेवाओं की कहानियां सुनते हुए प्रज्वल बड़े हुए। धीरे-धीरे पिता की देशसेवा उनके लिए प्रेरणा बन गई। उन्होंने बचपन से ही सेना में अधिकारी बनने का सपना देखना शुरू कर दिया और इसे पूरा करने का संकल्प ले लिया।

12वीं के बाद NDA की तैयारी, पहली कोशिश में मिली असफलता

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद प्रज्वल ने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में प्रवेश पाने के लिए तैयारी शुरू की। इसके लिए उन्होंने 12वीं के बाद एक साल का ब्रेक भी लिया। उनका लक्ष्य जल्द से जल्द सेना में अधिकारी बनना था।

पहले प्रयास में उन्होंने SSB की शुरुआती चयन प्रक्रिया पार कर ली, लेकिन मेडिकल परीक्षण में सफल नहीं हो सके। इस असफलता ने उनके रास्ते में बाधा जरूर खड़ी की, लेकिन सेना में जाने का जुनून कम नहीं हुआ। उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखने के साथ-साथ सैन्य अधिकारी बनने की तैयारी भी नहीं छोड़ी।

97.51 पर्सेंटाइल के बाद दो IIM से मिला ऑफर, फिर भी नहीं बदला फैसला

सेना में चयन नहीं होने की स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्रज्वल ने उच्च शिक्षा पर भी ध्यान दिया। उन्होंने पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में बीएससी इलेक्ट्रॉनिक्स में दाखिला लिया। पढ़ाई के दौरान उन्होंने CAT परीक्षा दी और शानदार प्रदर्शन करते हुए 97.51 पर्सेंटाइल हासिल किया।

उनकी इस उपलब्धि के बाद देश के प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों IIM इंदौर और IIM कोझिकोड में प्रवेश के अवसर मिले। यह किसी भी विद्यार्थी के लिए शानदार करियर बनाने का बड़ा मौका था, लेकिन प्रज्वल के मन में कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने दोनों संस्थानों के ऑफर ठुकरा दिए, क्योंकि उनके लिए पिता का सपना और देश की सेवा किसी भी अन्य उपलब्धि से बढ़कर थी।

आठ बार असफल हुए, नौवीं कोशिश में आखिरकार मिली सफलता

प्रज्वल ने सेना में अधिकारी बनने के लिए लगातार प्रयास जारी रखे। पहले मेडिकल परीक्षण में असफल होने के बाद उन्होंने सात और SSB इंटरव्यू दिए, लेकिन हर बार अंतिम चरण में उनका चयन नहीं हो सका। लगातार आठ असफलताओं के बाद उनके लिए यह सफर मानसिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण बन गया था।

एक समय ऐसा भी आया जब वह निराश होने लगे थे। इसी दौरान उनके पड़ोसी और शिक्षक नितिन कोठे ने उन्हें हिम्मत नहीं हारने और एक आखिरी प्रयास करने के लिए प्रेरित किया। शिक्षक की सलाह ने उनमें नया उत्साह भर दिया। प्रज्वल ने नौवीं बार फिर कोशिश की और आखिरकार SSB के साथ मेडिकल प्रक्रिया भी सफलतापूर्वक पार कर ली। इसके बाद उन्हें देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) में प्रशिक्षण का अवसर मिला।

दिसंबर 2024 में बने लेफ्टिनेंट, मां की आंखों में छलक उठा गर्व

कई वर्षों के संघर्ष, मेहनत और कठिन सैन्य प्रशिक्षण के बाद दिसंबर 2024 में प्रज्वल समरित भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन प्राप्त कर अधिकारी बन गए। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल उनका सपना पूरा किया, बल्कि कारगिल युद्ध में शहीद हुए पिता की इच्छा को भी एक नई पहचान दी।

बेटे को सेना की वर्दी में देखकर मां सविता समरित की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने अपने पति की उस इच्छा को याद किया, जिसमें वह चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा होकर सेना में अधिकारी बने। प्रज्वल की उपलब्धि पर मां ने गर्व से कहा, 'I Feel Proud'।

प्रज्वल की यह कहानी बताती है कि मजबूत इरादों के सामने बार-बार मिलने वाली असफलताएं भी रास्ता नहीं रोक सकतीं। पिता की शहादत से मिली प्रेरणा, मां की उम्मीद और अपने लक्ष्य के प्रति अटूट समर्पण ने उन्हें उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां पहुंचने का सपना उन्होंने बचपन से देखा था।