नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच पराली जलाने की घटनाओं को रोकना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। पंजाब और हरियाणा में सख्ती, जुर्माने और जागरूकता अभियान चलाए जाने के बावजूद खेतों में पराली जलाने का सिलसिला पूरी तरह थम नहीं रहा है। हैरानी की बात यह है कि अब इन घटनाओं की निगरानी करने वाले सैटेलाइट सिस्टम की सीमाओं का फायदा उठाकर किसान निगरानी से बचने की कोशिश कर रहे हैं। इसके चलते पराली जलाने की वास्तविक घटनाओं और सरकारी आंकड़ों के बीच अंतर होने की आशंका जताई जा रही है।
दिल्ली में प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट भी चिंता जता चुका है। अदालत ने वाहनों से निकलने वाले धुएं के साथ पराली जलाने को भी प्रदूषण के प्रमुख कारणों में शामिल माना है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब अंतरिक्ष से खेतों की निगरानी की जा रही है, तब भी पराली जलाने की सभी घटनाएं पकड़ में क्यों नहीं आ पा रही हैं।
रात के अंधेरे में पराली जलाकर निगरानी से बचने की कोशिश
पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट आधारित निगरानी व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इस व्यवस्था की एक बड़ी सीमा यह है कि सैटेलाइट हर समय किसी एक इलाके के ऊपर मौजूद नहीं रहते। वे निर्धारित कक्षा और समय के अनुसार ही किसी क्षेत्र से गुजरते हैं तथा तस्वीरें और आंकड़े जुटाते हैं।
इसी बात को समझते हुए कुछ किसान ऐसे समय पर खेतों में आग लगा रहे हैं, जब निगरानी करने वाले सैटेलाइट उस क्षेत्र के ऊपर मौजूद नहीं होते। रिपोर्ट के अनुसार, शाम और रात के समय पराली जलाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। ऐसे समय में आग लगाने से कई घटनाएं मौजूदा निगरानी प्रणाली की नजर से बच सकती हैं और उनका रिकॉर्ड तैयार नहीं हो पाता।
इस तरीके की तुलना पोखरण परमाणु परीक्षण के दौरान अपनाई गई रणनीति से भी की जा रही है। बताया जाता है कि तत्कालीन वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने अमेरिकी सैटेलाइट की निगरानी से बचने के लिए परीक्षण का समय इस तरह निर्धारित किया था कि गतिविधियां आसानी से पकड़ में न आएं।
मौजूदा सैटेलाइट सिस्टम क्यों नहीं पकड़ पा रहा पूरी सच्चाई?
पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी को बेहतर बनाने के लिए इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंट सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी (iFOREST) ने मल्टी-सैटेलाइट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म तैयार किया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य अलग-अलग सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारियों के आधार पर खेतों में आग लगने की घटनाओं का पता लगाना है।
iFOREST के सीईओ डॉ. चंद्र भूषण के मुताबिक मौजूदा निगरानी व्यवस्था अभी पूरी तस्वीर सामने लाने में सक्षम नहीं है। वर्तमान सिस्टम मुख्य रूप से पोलर ऑर्बिटिंग सैटेलाइट के जरिए आग की घटनाओं का पता लगाता है।
इससे यह जानकारी तो मिल जाती है कि किन स्थानों पर आग लगी है, लेकिन आग किस समय लगाई गई, कितने बड़े क्षेत्र में पराली जलाई गई और उसका वास्तविक प्रभाव कितना रहा, इसकी पूरी जानकारी हासिल करना मुश्किल होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए केवल आग की घटनाओं की गिनती पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके समय, स्थान और प्रभावित क्षेत्र का सटीक आकलन भी जरूरी है।
80 हजार से घटकर 6 हजार रह गईं घटनाएं, क्या आंकड़े पूरी तरह सही हैं?
पराली जलाने के सरकारी आंकड़ों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2021 में पराली जलाने की लगभग 80 हजार घटनाएं दर्ज की गई थीं, जबकि वर्ष 2025 में यह संख्या घटकर करीब 6 हजार रह गई।
इस गिरावट के पीछे सरकार की सख्ती, जुर्माने, जागरूकता अभियान और पराली प्रबंधन के लिए उपलब्ध कराई गई आधुनिक मशीनों को अहम वजह माना जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञ इस बात की ओर भी ध्यान दिला रहे हैं कि घटनाओं में दर्ज कमी का एक कारण सैटेलाइट निगरानी से बचकर पराली जलाना भी हो सकता है।
यही वजह है कि वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि निगरानी प्रणाली सभी घटनाओं को रिकॉर्ड नहीं कर पा रही है, तो केवल दर्ज आंकड़ों के आधार पर पराली जलाने में आई कमी का सही आकलन करना मुश्किल हो सकता है।
नासा के चार सिस्टम भी नहीं दे पा रहे हर समय की जानकारी
वर्तमान में पराली जलाने की घटनाओं का पता लगाने के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के मॉडरेट रेजोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोरेडियोमीटर (MODIS) और विजिबल इन्फ्रारेड इमेजिंग रेडियोमीटर (VIIRS) जैसे सैटेलाइट उपकरणों की मदद ली जाती है।
इन प्रणालियों के माध्यम से खेतों में आग लगने की पहचान कर अलर्ट जारी किए जाते हैं। हालांकि इनकी भी अपनी सीमाएं हैं। सैटेलाइट किसी निश्चित समय पर ही संबंधित इलाके की निगरानी कर पाते हैं। सामान्य तौर पर इनके गुजरने का समय दोपहर के आसपास होता है। ऐसे में यदि खेतों में आग इससे अलग समय पर लगाई जाती है, तो उसके रिकॉर्ड होने की संभावना प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा मौजूदा तकनीक से आग लगने वाले स्थान का पता तो चल सकता है, लेकिन प्रभावित क्षेत्र का वास्तविक आकार और उससे होने वाले नुकसान का पूरा आकलन हमेशा संभव नहीं हो पाता।
प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए निगरानी व्यवस्था में बदलाव जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार, पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए निगरानी व्यवस्था को अधिक व्यापक और प्रभावी बनाने की जरूरत है। अलग-अलग सैटेलाइट से मिलने वाले आंकड़ों को एक साथ जोड़कर विश्लेषण करने से ऐसी घटनाओं की पहचान बेहतर तरीके से की जा सकती है।
इसके साथ ही खेतों में पराली प्रबंधन के वैकल्पिक उपायों को बढ़ावा देना भी जरूरी है, ताकि किसानों को फसल अवशेष जलाने की मजबूरी न रहे। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण की समस्या को कम करने के लिए वास्तविक आंकड़ों का सामने आना बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि जब तक पराली जलाने की सही संख्या और उसका प्रभाव सामने नहीं आएगा, तब तक इस समस्या के समाधान की दिशा में बनाई जाने वाली योजनाओं की प्रभावशीलता पर भी सवाल बने रहेंगे।
