पटना। बिहार की राजनीति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर की गई व्यक्तिगत टिप्पणियां एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पटना में दिए गए बयान ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कांग्रेस पर हमला बोलने का नया अवसर दे दिया है। चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे मुद्दों पर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहे विपक्ष के सामने अब बयानबाजी का विवाद खड़ा हो गया है। खरगे की टिप्पणी 'मोदी का बाप भी जाएगा' को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। इस बयान के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या कांग्रेस एक बार फिर अपने राजनीतिक मुद्दों से ध्यान हटाकर व्यक्तिगत टिप्पणियों के विवाद में उलझ गई है?
मां पर टिप्पणी के बाद बिहार चुनाव में कांग्रेस को मिली थीं सिर्फ छह सीटें
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मां को लेकर कांग्रेस के एक नेता की अभद्र टिप्पणी ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया था। उस समय कांग्रेस विपक्ष के रूप में कई मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मां पर की गई टिप्पणी ने चुनावी चर्चा की दिशा बदल दी। चुनाव परिणाम आने पर कांग्रेस को केवल छह सीटों से संतोष करना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषण के नजरिये से यह सवाल उठाया जाता रहा कि क्या व्यक्तिगत टिप्पणियों ने कांग्रेस के चुनावी संदेश को कमजोर किया था।
अब मल्लिकार्जुन खरगे के बयान ने इसी पुराने विवाद की याद ताजा कर दी है। प्रधानमंत्री के पिता को लेकर की गई टिप्पणी को भाजपा कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक मुद्दा बना सकती है। बिहार से शुरू हुआ यह विवाद आने वाले समय में उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन सकता है। हालांकि, किसी बयान का चुनावी परिणाम पर कितना असर पड़ेगा, यह मतदाताओं की प्रतिक्रिया और चुनावी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
जब 'मौत का सौदागर' बयान से भाजपा को मिला था पलटवार का मौका
कांग्रेस की बयानबाजी और उसके राजनीतिक प्रभाव की चर्चा करते समय 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव का उदाहरण भी दिया जाता है। उस समय कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नरेन्द्र मोदी के लिए 'मौत का सौदागर' शब्द का इस्तेमाल किया था। भाजपा ने इस टिप्पणी को गुजरात के गौरव और राज्य के सम्मान से जोड़कर चुनाव प्रचार में उठाया। इस बयान के बाद राजनीतिक बहस का एक बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत टिप्पणी और उसके जवाब पर केंद्रित हो गया।
नरेन्द्र मोदी और भाजपा ने इस टिप्पणी को अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। गुजरात में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। इस घटना का उल्लेख अक्सर इस बात के उदाहरण के रूप में किया जाता है कि चुनाव के दौरान विरोधियों पर की गई तीखी व्यक्तिगत टिप्पणियां कभी-कभी उलटा असर भी डाल सकती हैं। कांग्रेस के लिए चुनौती यह रही है कि वह सरकार की नीतियों और अपने मुद्दों पर बहस को केंद्र में बनाए रखे।
2014 के चुनाव में चाय बेचने वाली टिप्पणी पर भी हुआ था विवाद
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने नरेन्द्र मोदी को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि मोदी कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते और यदि वे चायवाले हैं तो कांग्रेस अधिवेशन में आकर चाय बेच सकते हैं। उस समय नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में उभर रहे थे।
भाजपा ने इस टिप्पणी को आम आदमी के सम्मान और मोदी की पृष्ठभूमि से जोड़कर प्रचारित किया। इसके बाद चाय बेचने वाले व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने की संभावना और राजनीतिक प्रतिष्ठा का मुद्दा चुनावी विमर्श में चर्चा का विषय बना। भाजपा ने इस विवाद का इस्तेमाल कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए किया। 2014 के चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। हालांकि, इस जीत के पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और चुनावी कारक थे, इसलिए परिणाम को केवल एक बयान से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।
राहुल गांधी के 'जहर की खेती' बयान पर भी भाजपा ने किया था पलटवार
2014 के चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा था कि वह 'जहर की खेती' करती है। उन्होंने यह भी कहा था कि भाजपा के सत्ता में आने पर भयंकर हिंसा होगी और 22 हजार लोग मारे जाएंगे। इस बयान को लेकर भाजपा ने कांग्रेस पर हमला बोला और इसे डर पैदा करने वाला बयान बताया।
इस विवाद के कारण भी राजनीतिक बहस का एक हिस्सा कांग्रेस के आरोपों और भाजपा के जवाबों पर केंद्रित हो गया। चुनावी राजनीति में किसी पार्टी के लिए यह महत्वपूर्ण होता है कि वह अपने विरोधियों पर आरोप लगाते समय ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करे, जिनका राजनीतिक और कानूनी स्तर पर बचाव किया जा सके। विपक्ष की भूमिका सरकार से सवाल पूछना है, लेकिन आरोपों की विश्वसनीयता और भाषा भी जनता के बीच उसकी छवि को प्रभावित कर सकती है।
'चौकीदार चोर है' से 'सारे मोदी चोर हैं' तक पहुंचा था विवाद
2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए 'चौकीदार चोर है' का नारा दिया था। इसके बाद 'सारे मोदी चोर हैं' टिप्पणी को लेकर भी विवाद हुआ। इन बयानों ने कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया।
'चौकीदार चोर है' टिप्पणी को लेकर राहुल गांधी ने अदालत में बिना शर्त लिखित माफी मांगी थी। अदालत ने उन्हें भविष्य में अपने बयानों को लेकर सतर्क रहने की चेतावनी भी दी थी। कर्नाटक में एक चुनावी सभा के दौरान राहुल गांधी ने यह सवाल भी उठाया था कि चोरों के नाम में मोदी क्यों जुड़ा होता है। इस टिप्पणी को लेकर भी उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हुई।
सुशील कुमार मोदी ने पटना में दर्ज कराया था मानहानि का मामला
राहुल गांधी की 'सारे मोदी चोर हैं' टिप्पणी के बाद बिहार भाजपा के तत्कालीन वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी ने पटना की अदालत में उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था। सुशील कुमार मोदी अब दिवंगत हैं। इस मामले में राहुल गांधी को पटना आकर अदालत में पेश होना पड़ा था और पेशी के बाद उन्हें जमानत मिली थी।
इसी टिप्पणी से जुड़े एक अन्य मानहानि मामले में गुजरात के सूरत की अदालत ने 2023 में राहुल गांधी को दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई थी। इस फैसले के बाद उनकी संसद सदस्यता रद्द हो गई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उनकी सांसदी बहाल हुई। इस पूरे प्रकरण ने राजनीतिक भाषणों में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों और उनके कानूनी परिणामों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ी थी।
खरगे के बयान से कांग्रेस के सामने फिर खड़ा हुआ राजनीतिक सवाल
मल्लिकार्जुन खरगे के पटना में दिए गए बयान के बाद कांग्रेस के सामने एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि सरकार को घेरने के लिए उठाए जा रहे मुद्दों को जनता तक किस तरह पहुंचाया जाए। चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और कथित वोट चोरी जैसे मुद्दों पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री के परिवार को लेकर की गई टिप्पणी ने राजनीतिक बहस को एक अलग दिशा दे दी है।
भाजपा को अब कांग्रेस की भाषा और उसके नेताओं के बयानों पर हमला करने का अवसर मिल गया है। इससे कांग्रेस के मूल राजनीतिक मुद्दों को कितना नुकसान होगा, इसका आकलन आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम और जनता की प्रतिक्रिया के आधार पर ही किया जा सकेगा। फिलहाल इस विवाद ने दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप को तेज कर दिया है।
क्या उत्तर प्रदेश समेत दूसरे राज्यों में भी दिखेगा बयान का असर?
बिहार के बाद उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों के संदर्भ में भी खरगे की टिप्पणी को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा इस बयान को कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति से जोड़कर पेश कर सकती है, जबकि कांग्रेस को अपने मुद्दों पर ध्यान बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि, चुनावी नतीजे केवल नेताओं के बयानों से तय नहीं होते। स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, संगठन, मतदाताओं की अपेक्षाएं और सरकार के कामकाज सहित अनेक कारक परिणामों को प्रभावित करते हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि खरगे के बयान से कांग्रेस को निश्चित रूप से चुनावी नुकसान होगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस विवाद ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने के लिए एक नया मुद्दा जरूर उपलब्ध करा दिया है।
