ere | Source: ereलखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 (UP Assembly Elections 2027) के अभी से सियासी सुर तेज होने लगे हैं। राज्य में समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस (Congress) के बीच आगामी चुनाव को लेकर सीट बंटवारे पर अंदरखाने बातचीत शुरू हो चुकी है। कांग्रेस पार्टी ने करीब 200 विधानसभा क्षेत्रों की एक खास सूची तैयार की है, जिन पर वह चुनाव लड़ने की इच्छा जता रही है। हालांकि, पार्टी का यह भी साफ कहना है कि इस सूची का मतलब गठबंधन से जबरन इतनी ही सीटें मांगना नहीं है। कांग्रेस के लिए सीटों की निश्चित संख्या से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण गठबंधन में अपना सम्मानजनक वजूद और हिस्सेदारी बचाना है। लेकिन सवाल यह है कि जिस पार्टी का पिछला चुनावी इतिहास बेहद कमजोर रहा है, वह इतने बड़े दांव कैसे खेल रही है?

चार श्रेणियों में बंटी कांग्रेस की रणनीतिक योजना सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस की ओर से तैयार की गई 200 सीटों की इस लंबी फेहरिस्त को चार अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है, ताकि बातचीत के दौरान प्राथमिकताओं को स्पष्ट रखा जा सके:

  • श्रेणी A: इन सीटों को लेकर कांग्रेस का रुख सबसे ज्यादा आक्रामक और सख्त है। पार्टी इन पर अपने दावे से पीछे हटने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है।
  • श्रेणी B: इस श्रेणी की सीटों पर कांग्रेस कुछ स्थानीय बदलावों और आंशिक फेरबदल पर विचार कर सकती है।
  • श्रेणी C और D: इन दोनों श्रेणियों में शामिल सीटों पर कांग्रेस गठबंधन के साथियों के साथ समझौते और बदलाव के लिए पूरी तरह लचीला रुख अपनाने को तैयार है।

कांग्रेस का 38 साल का गिरता हुआ ट्रैक रिकॉर्ड अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के सामने इतनी बड़ी मांग रखने वाली कांग्रेस पार्टी का अगर पिछले 38 सालों का राजनीतिक इतिहास खंगाला जाए, तो उत्तर प्रदेश में पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे ही गया है:

  • 1985 का स्वर्णिम दौर: साल 1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 269 सीटें जीतकर अपने दम पर सरकार बनाई थी, जो राज्य में उसकी आखिरी पूर्ण बहुमत की सरकार थी।
  • 1989 के बाद आई गिरावट: साल 1989 के चुनाव में कांग्रेस सिमटकर 94 सीटों पर आ गई और जनता दल ने सत्ता संभाली। इसके बाद 1991 में पार्टी को 46 और 1993 में केवल 28 सीटें ही हासिल हुईं।
  • 2000 के दशक का संघर्ष: साल 2002 में कांग्रेस को 25 और 2007 के चुनाव में सिर्फ 22 सीटें मिलीं। साल 2012 में थोड़ा सुधार हुआ और पार्टी ने 28 सीटें जीतीं, लेकिन सपा की 224 सीटों के आगे यह बहुत कम था।
  • गठबंधन के बावजूद सात सीटें: साल 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। सपा ने कांग्रेस को 105 सीटें दी थीं, लेकिन इसके बावजूद पार्टी सिर्फ 7 सीटों पर ही सिमटकर रह गई।
  • 2022 का सबसे खराब प्रदर्शन: पिछले यानी 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अकेले मैदान में उतरी और 403 सीटों वाली विधानसभा में महज 2 सीटें ही जीत पाई। यानी पिछले दो लगातार यूपी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस 'डबल डिजिट' (10 का आंकड़ा) को भी पार नहीं कर सकी है।

प्रियंका गांधी की बैठकों के बाद तेज हुई सुगबुगाहट सपा और कांग्रेस के बीच चल रही इस सीट शेयरिंग की सुगबुगाहट के पीछे कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की अगुवाई में हुई आंतरिक बैठकों को अहम माना जा रहा है। इन बैठकों में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष आराधना मिश्रा, कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद और राज्य प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने हिस्सा लिया। पार्टी नेताओं का साफ कहना है कि उनका मकसद केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि गठबंधन में अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करना है ताकि पार्टी कमजोर न पड़े।

2024 के लोकसभा परिणामों से जगी नई उम्मीद गौरतलब है कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर एनडीए का मुकाबला किया था। उस चुनाव में सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिससे दोनों दलों का संयुक्त आंकड़ा 43 तक पहुंच गया था। इसी सफलता से उत्साहित होकर कांग्रेस अब 2027 के विधानसभा चुनाव में भी अपनी मजबूत हिस्सेदारी चाहती है। बहरहाल, देखना यह होगा कि अखिलेश यादव कांग्रेस की इस भारी-भरकम मांग पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या दोनों दल आपसी सहमति का कोई ठोस फार्मूला निकाल पाते हैं या नहीं।