बच्चों की परवरिश केवल उन्हें अच्छी शिक्षा देने और उनकी जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें आत्मसम्मान, अपनी पसंद-नापसंद और दूसरों के साथ व्यवहार करने की समझ देना भी उतना ही जरूरी है। बॉलीवुड अभिनेत्री नेहा धूपिया ने अपने बच्चों की परवरिश से जुड़ी ऐसी ही महत्वपूर्ण बातें साझा की हैं, जो हर माता-पिता के लिए उपयोगी सीख बन सकती हैं। अभिनेत्री ने बताया कि उन्होंने अपनी बेटी मेहर को सबसे पहले जो शब्द सिखाया था, वह था ‘बस’। इसके पीछे उनका उद्देश्य बेटी को अपनी इच्छा जाहिर करने, असहज स्थिति में मना करने और अपनी व्यक्तिगत सीमाओं को समझने के लिए प्रोत्साहित करना था।
बेटी को सबसे पहले क्यों सिखाया ‘बस’ कहना?
नेहा धूपिया दो बच्चों की मां हैं। उनकी बेटी मेहर और बेटा गुरिक हैं। बच्चों की परवरिश के दौरान नेहा इस बात पर जोर देती हैं कि बच्चे अपनी भावनाओं को समझें और जरूरत पड़ने पर स्पष्ट रूप से अपनी बात कह सकें। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि उन्होंने अपनी बेटी को सबसे पहले ‘बस’ शब्द सिखाया, ताकि वह किसी ऐसी चीज के लिए मना कर सके, जिसे वह नहीं करना चाहती।
नेहा के अनुसार, यदि उनकी बेटी खाना नहीं खाना चाहती, तो वह साफ शब्दों में ‘बस’ कह सकती है। इसी तरह, यदि कोई उसे ऐसी चीज करने के लिए कहता है, जिसमें वह सहज महसूस नहीं करती, तो उसे अपनी असहमति जाहिर करने का अधिकार होना चाहिए।
अभिनेत्री ने समझाया कि बच्चों को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उन्हें हर परिस्थिति में दूसरों की बात माननी ही है। वे अपनी पसंद और नापसंद बता सकते हैं। बच्चों को अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी चीज के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। नेहा की यह सोच बच्चों को छोटी उम्र से ही अपनी भावनाओं और व्यक्तिगत सीमाओं के प्रति जागरूक बनाने पर जोर देती है।
बच्चों को सिखाएं कि अपनी मर्जी के खिलाफ ‘हां’ कहना जरूरी नहीं
बच्चों के व्यक्तित्व विकास में अपनी बात रखने की क्षमता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कई बार बच्चे बड़ों की बात मानने या उन्हें नाराज करने से बचने के लिए अपनी परेशानी जाहिर नहीं कर पाते। ऐसे में माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को समझाएं कि किसी बात से असहज होने पर मना करना गलत नहीं है।
नेहा धूपिया की परवरिश से जुड़ी सीख इसी बात को सामने लाती है। यदि बच्चा खाना नहीं चाहता, किसी के व्यवहार से असहज है या किसी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेना चाहता, तो उसकी बात सुनी जानी चाहिए। बच्चों को अपनी पसंद बताने का अवसर देना और उनकी असहमति का सम्मान करना उनके आत्मविश्वास को मजबूत करने में मदद कर सकता है।
माता-पिता को यह भी समझना चाहिए कि बच्चों की ‘ना’ को जिद समझकर नजरअंदाज करना हमेशा उचित नहीं होता। कई बार बच्चा अपनी परेशानी या असहजता को व्यक्त करने की कोशिश कर रहा होता है। ऐसे में उसे डांटने के बजाय उसकी बात समझना अधिक जरूरी है।
कोई बदतमीजी करे तो वहां से हट जाना बेहतर
नेहा धूपिया ने बच्चों को आत्मसम्मान की अहमियत सिखाने पर भी जोर दिया है। उनके मुताबिक, चाहे कार्यस्थल हो या फिल्म का सेट, यदि कोई व्यक्ति बदतमीजी करता है या सम्मान नहीं देता, तो ऐसी स्थिति में अपनी सीमाएं तय करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को यह पता होना चाहिए कि निजी और पेशेवर जीवन में उसे किस तरह के व्यवहार को स्वीकार करना है।
नेहा की इस सीख का महत्व बच्चों की परवरिश में भी दिखाई देता है। बच्चों को छोटी उम्र से ही बताया जाना चाहिए कि दूसरों का सम्मान करना जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे अपने सम्मान से समझौता करें। यदि कोई उनके साथ गलत व्यवहार करता है, तो उन्हें अपनी परेशानी बताने और जरूरत पड़ने पर वहां से हटने का अधिकार है।
बच्चों को यह समझाना भी आवश्यक है कि सम्मान दोनों तरफ से होना चाहिए। उन्हें दूसरों की भावनाओं और सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए, साथ ही अपनी सीमाओं का सम्मान करने की अपेक्षा भी रखनी चाहिए।
बच्चों को किसी का खिलौना न समझें, उनकी भावनाओं का करें सम्मान
नेहा धूपिया ने अपनी बेटी को ‘बस’ कहने की सीख देते हुए यह भी समझाया कि बच्चे किसी के मनोरंजन का साधन नहीं हैं। यदि कोई बच्चा खाना नहीं खाना चाहता या किसी के गाल खींचने जैसी हरकत से असहज महसूस करता है, तो उसकी इच्छा को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
अक्सर परिवारों और सामाजिक आयोजनों में बच्चों को प्यार जताने के लिए गोद में उठाया जाता है, गाल खींचे जाते हैं या उन्हें जबरन खाना खिलाने की कोशिश की जाती है। ऐसे समय में बच्चे की सहजता और उसकी इच्छा पर ध्यान देना जरूरी है। प्यार जताने का तरीका ऐसा होना चाहिए, जिससे बच्चा सुरक्षित और सहज महसूस करे।
बच्चों को यह सिखाना भी जरूरी है कि यदि उन्हें किसी व्यवहार से परेशानी हो रही है, तो वे स्पष्ट रूप से अपनी बात कह सकते हैं। साथ ही, परिवार के बड़ों को भी बच्चों की बात सुनकर उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
माता-पिता का तनाव बच्चों पर नहीं पड़ना चाहिए
नेहा धूपिया ने यह भी स्वीकार किया कि माता-पिता होने के साथ-साथ वे भी इंसान हैं। उन्हें निजी जीवन, कामकाज और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी दिन के अंत तक व्यक्ति थका हुआ, निराश या तनावग्रस्त महसूस कर सकता है।
लेकिन नेहा के अनुसार, अपनी परेशानियों का असर बच्चों पर पड़ने देना उचित नहीं है। माता-पिता को अपनी भावनाओं को संभालना सीखना चाहिए, ताकि उनके तनाव या निराशा का बोझ बच्चों को न उठाना पड़े।
अभिनेत्री की इस बात का अर्थ यह नहीं है कि माता-पिता को अपनी भावनाएं छिपानी चाहिए। बल्कि जरूरी यह है कि वे अपनी भावनाओं को स्वस्थ तरीके से व्यक्त करें और बच्चों के साथ व्यवहार करते समय अपनी परेशानी को उन पर न उतारें। बच्चे अपने आसपास के माहौल से बहुत कुछ सीखते हैं। इसलिए माता-पिता का व्यवहार उनके भावनात्मक विकास पर प्रभाव डाल सकता है।
बच्चों की परवरिश में संतुलन बनाना क्यों जरूरी?
नेहा धूपिया की बातें बताती हैं कि अच्छी परवरिश के लिए बच्चों की जरूरतों के साथ उनकी भावनाओं को समझना भी जरूरी है। बच्चों को अनुशासन सिखाना महत्वपूर्ण है, लेकिन अनुशासन का अर्थ उनकी हर इच्छा को दबाना नहीं होना चाहिए। उन्हें यह समझने का अवसर मिलना चाहिए कि कौन-सा व्यवहार सही है, किस परिस्थिति में मना करना जरूरी है और अपनी बात सम्मानपूर्वक कैसे रखी जा सकती है।
माता-पिता बच्चों को रोजमर्रा की छोटी-छोटी परिस्थितियों के माध्यम से यह सीख दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, बच्चे की पसंद पूछना, उसकी असहमति सुनना, उसकी परेशानी को गंभीरता से लेना और उसे अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर देना उपयोगी हो सकता है।
नेहा धूपिया की परवरिश से जुड़ी सीख का सार यही है कि बच्चों को केवल दूसरों की बात मानना नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं को पहचानना और अपनी सीमाओं की रक्षा करना भी सिखाया जाना चाहिए। ‘बस’ जैसा छोटा-सा शब्द बच्चे को अपनी इच्छा व्यक्त करने का भरोसा दे सकता है। माता-पिता यदि बच्चों की बात सुनें और उनके आत्मसम्मान का ध्यान रखें, तो वे उन्हें अधिक आत्मविश्वासी और अपनी सीमाओं के प्रति जागरूक बनने में मदद कर सकते हैं।
