सासाराम। सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा और सुविधाएं देने के दावों के बीच बिहार के रोहतास जिले के एक प्राथमिक विद्यालय की तस्वीर चिंताजनक है। कोचस प्रखंड की चितौली पंचायत स्थित रूपिबांध प्राथमिक विद्यालय में कक्षा पहली से पांचवीं तक के 82 बच्चों को महज 20×15 फुट के एक कमरे में पढ़ाया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि पांच कक्षाओं के लिए स्कूल में सिर्फ एक ब्लैकबोर्ड है और बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी चार शिक्षकों पर है। एक ही कमरे में प्रधानाध्यापक का कार्यालय और मध्याह्न भोजन का सामान भी रखा जाता है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई किस तरह होती होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

एक कमरे में पांच कक्षाएं, पढ़ाई के लिए जगह तक नहीं

रूपिबांध प्राथमिक विद्यालय की स्थापना वर्ष 1996 में हुई थी। यहां पहले से ही सीमित संसाधनों के बीच पढ़ाई हो रही थी, लेकिन दूसरे प्राथमिक विद्यालय का विलय होने के बाद विद्यार्थियों की संख्या बढ़ गई। इसके बावजूद कक्षाओं की व्यवस्था में अपेक्षित विस्तार नहीं हुआ। अब पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों को एक ही कमरे में बैठकर पढ़ना पड़ता है। इसी कमरे में प्रधानाध्यापक का कार्यालय चलाने के साथ मध्याह्न भोजन के अनाज और बर्तनों को भी रखा जाता है। जगह की कमी के कारण बच्चों को व्यवस्थित ढंग से बैठाना और अलग-अलग कक्षाओं का संचालन करना शिक्षकों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

पांच कक्षाओं के लिए सिर्फ एक ब्लैकबोर्ड

स्कूल में पांचों कक्षाओं के लिए केवल एक ब्लैकबोर्ड उपलब्ध है। ऐसे में शिक्षक अलग-अलग कक्षाओं को पढ़ाने के लिए इसी बोर्ड का सहारा लेते हैं। प्रधानाध्यापक शशांक कुमार तिवारी के मुताबिक, कई बार कक्षाओं को बारी-बारी से ब्लैकबोर्ड साझा करना पड़ता है। एक दिन तीसरी कक्षा को अंग्रेजी पढ़ाई जाती है, तो दूसरे दिन चौथी कक्षा को हिंदी पढ़ाने के लिए बोर्ड का इस्तेमाल होता है। प्रधानाध्यापक और बच्चों ने गत्ते से एक अस्थायी ब्लैकबोर्ड बनाने की कोशिश भी की, लेकिन उसे लगाने के लिए दीवार पर पर्याप्त जगह नहीं मिली। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्कूल में बुनियादी शैक्षणिक संसाधनों की कितनी कमी है।

शोरगुल के बीच पढ़ाई, बच्चों का ध्यान लगाना मुश्किल

एक ही कमरे में पांचों कक्षाओं के चलने से लगातार शोरगुल बना रहता है। एक कक्षा के बच्चों की आवाज दूसरी कक्षा तक पहुंचती है, जिससे विद्यार्थियों को शिक्षकों की बातें सुनने और पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होती है। पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों का कहना है कि सभी कक्षाएं एक साथ चलने के कारण शिक्षक क्या समझा रहे हैं, यह ठीक से सुन पाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे माहौल में बच्चों को विषय समझने और सवाल पूछने के लिए पर्याप्त अवसर मिलना भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। गतिविधि आधारित और रचनात्मक पढ़ाई के लिए जरूरी जगह तथा संसाधनों का भी अभाव है।

82 बच्चों के लिए चार शिक्षक, सुविधाओं की भी कमी

विद्यालय में कुल 82 बच्चे नामांकित हैं और प्रधानाध्यापक सहित चार शिक्षक उनकी पढ़ाई की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इसके अलावा एक रसोइया भी है। इतने बच्चों और कर्मचारियों के लिए सिर्फ एक कमरा उपलब्ध है। अतिरिक्त कक्ष न होने से विद्यालय में पढ़ाई के लिए अलग-अलग स्थान बनाने की गुंजाइश नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, विद्यालय में पर्याप्त जगह और संसाधनों की कमी के बीच बच्चों को पढ़ना पड़ रहा है। शौचालय, खेल के मैदान और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बेहतर शैक्षणिक माहौल के लिए केवल शिक्षकों की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि उपयुक्त कक्षाओं और जरूरी सुविधाओं का होना भी आवश्यक है।

शिक्षा विभाग ने भेजा अतिरिक्त कमरों का प्रस्ताव

विद्यालय की स्थिति को लेकर कोचस प्रखंड के शिक्षा अधिकारी सुरेश राज ने बताया कि कक्षाओं की कमी से जूझ रहे स्कूलों की सूची तैयार की गई है। अतिरिक्त कमरों के निर्माण के लिए प्रस्ताव उच्च अधिकारियों और विभाग को भेजा गया है। वहीं, जिला कार्यक्रम अधिकारी एवं प्रभारी जिला शिक्षा पदाधिकारी रोहित चौरसिया ने मामले की जांच कराने का आश्वासन दिया है। अब देखना होगा कि विभाग इस समस्या के समाधान के लिए कितनी जल्दी कदम उठाता है और विद्यालय को अतिरिक्त कमरे कब तक उपलब्ध कराए जाते हैं।

बच्चों के भविष्य के लिए जरूरी है जल्द समाधान

रूपिबांध प्राथमिक विद्यालय की स्थिति बताती है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन और शिक्षकों की व्यवस्था के साथ-साथ बुनियादी ढांचे पर ध्यान देना भी जरूरी है। एक ही कमरे में पांच कक्षाओं का संचालन बच्चों की पढ़ाई और शिक्षकों के कामकाज, दोनों को प्रभावित कर रहा है। अभिभावकों और स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि शिक्षा विभाग जल्द कार्रवाई करेगा, ताकि बच्चों को पर्याप्त जगह, जरूरी संसाधन और पढ़ाई के लिए बेहतर वातावरण मिल सके। सवाल यह है कि जब एक कमरे में पांच कक्षाओं के 82 बच्चों को पढ़ना पड़ रहा है, तो उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का लक्ष्य कैसे पूरा होगा?