नई दिल्ली। बच्चे के ज्यादा चंचल होने, बार-बार ध्यान भटकने या जिद करने पर कई माता-पिता उसे डांटकर और सख्ती करके सुधारने की कोशिश करते हैं। कई लोगों को यह भी लगता है कि अगर बच्चे को लगातार अनुशासन में रखा जाए और उसकी गलतियों पर डांटा जाए तो ADHD यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर जैसी समस्या भी खत्म हो सकती है। लेकिन विशेषज्ञ के अनुसार यह धारणा सही नहीं है। चाइल्ड साइकेट्रिस्ट डॉ. गायत्री राठौड़ ने ADHD को लेकर समाज में मौजूद ऐसी ही गलतफहमियों को स्पष्ट किया है।
क्या सख्ती और डांट से ADHD खत्म हो सकता है?
ADHD से जुड़े सबसे आम भ्रमों में से एक यह है कि बच्चे को ज्यादा डांटने, सख्त नियमों में रखने या कड़े अनुशासन के जरिए उसकी समस्या को ठीक किया जा सकता है। विशेषज्ञ के मुताबिक ऐसा नहीं है।
बच्चे को डांटने से ADHD की मूल समस्या समाप्त नहीं होती। इसके उलट, लगातार डांट या अत्यधिक सख्ती बच्चे के तनाव को बढ़ा सकती है। इसलिए केवल सजा या कठोर व्यवहार को ADHD के समाधान के तौर पर देखना उचित नहीं माना जाता।
ADHD को खराब परवरिश से जोड़ना भी गलत
डॉ. गायत्री राठौड़ के अनुसार ADHD को लेकर समाज में एक और बड़ी गलत धारणा मौजूद है कि यह खराब परवरिश का परिणाम होता है। यानी कुछ लोग मानते हैं कि अगर माता-पिता बच्चे को सही तरीके से अनुशासित करते तो उसे ADHD नहीं होता।
विशेषज्ञ के अनुसार यह सोच भी सही नहीं है। ADHD को केवल माता-पिता की परवरिश या बच्चे के पालन-पोषण की कमी से जोड़ना उचित नहीं है। माता-पिता अपने बच्चे में ADHD पैदा नहीं करते।
ADHD क्या है? समझिए इसकी असली प्रकृति
विशेषज्ञ के मुताबिक ADHD एक न्यूरो डेवलपमेंटल स्थिति है। इसका मतलब यह है कि इसे केवल बच्चे के व्यवहार या उसकी परवरिश से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
ऐसे में यदि बच्चा ध्यान केंद्रित करने में परेशानी महसूस करता है, अत्यधिक सक्रिय रहता है या उसके व्यवहार से जुड़ी कुछ अन्य समस्याएं दिखाई देती हैं, तो उसे केवल शरारती या अनुशासनहीन मान लेना सही तरीका नहीं है। ADHD को समझने के लिए बच्चे के व्यवहार और उसकी जरूरतों को सही नजरिए से देखना जरूरी है।
माता-पिता का व्यवहार फिर क्यों है महत्वपूर्ण?
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं होती। विशेषज्ञ का कहना है कि बच्चे को समझना और उसे उचित सहयोग देना उसके लक्षणों को संभालने में मदद कर सकता है।
माता-पिता यदि बच्चे के व्यवहार को समझने की कोशिश करें और उसे आवश्यक सहयोग दें, तो उसके लिए रोजमर्रा की चुनौतियों से निपटना आसान हो सकता है। इसलिए ADHD की स्थिति में बच्चे को केवल डांटने के बजाय उसके व्यवहार को समझना और उचित सहायता देना अधिक महत्वपूर्ण है।
सख्त परवरिश को इलाज समझने की गलती न करें
ADHD के मामले में एक और आम धारणा है कि बहुत सख्त परवरिश अपनाने से यह स्थिति ठीक हो जाएगी। डॉ. गायत्री राठौड़ के अनुसार यह भी एक गलतफहमी है।
सख्ती ADHD के लक्षणों को खत्म करने का उपाय नहीं है। यदि बच्चे पर लगातार दबाव बनाया जाए या छोटी-छोटी बातों पर उसे डांटा जाए, तो उसका तनाव बढ़ सकता है। इसलिए अनुशासन और कठोरता के बीच अंतर समझना बेहद जरूरी है।
बच्चे को समझना है पहला कदम
ADHD से जुड़े व्यवहार को केवल जिद, शरारत या खराब अनुशासन के चश्मे से देखने के बजाय उसके पीछे की स्थिति को समझना जरूरी है। बच्चे को बार-बार डांटने से समस्या का समाधान होने की गारंटी नहीं है।
विशेषज्ञ की सलाह का मूल संदेश यही है कि ADHD को लेकर माता-पिता और समाज में सही जानकारी होना जरूरी है। इसे खराब परवरिश का नतीजा मानना या सख्ती को इसका इलाज समझना दोनों ही गलत धारणाएं हैं।
डांट नहीं, समझ और सही सहयोग जरूरी
ADHD को लेकर फैली गलतफहमियां बच्चे और परिवार दोनों के लिए परेशानी बढ़ा सकती हैं। चाइल्ड साइकेट्रिस्ट डॉ. गायत्री राठौड़ ने स्पष्ट किया है कि ADHD एक न्यूरो डेवलपमेंटल स्थिति है और इसे केवल डांट-डपट या सख्त परवरिश से ठीक नहीं किया जा सकता।
ऐसे में बच्चे के व्यवहार को समझना, उसे सहयोग देना और उसकी जरूरतों के प्रति संवेदनशील रहना महत्वपूर्ण है। सही जानकारी के जरिए ही माता-पिता ADHD से जुड़े भ्रम से बाहर निकलकर बच्चे के लिए बेहतर माहौल तैयार कर सकते हैं।
