erer | Source: ereमुंबई/छत्तीसगढ़। गरीबी, अभाव और संघर्ष के बीच भी अगर हौसला मजबूत हो, तो मंजिल तक पहुंचने का रास्ता निकल ही आता है। भारतीय वन सेवा के अधिकारी गौतम पाडीभर की कहानी इसकी मिसाल है। कभी परिवार का पेट पालने के लिए उनकी मां को गांव में दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ी और मुंबई की झुग्गी-बस्ती में कबाड़ बीनकर गुजारा करना पड़ा। लेकिन उन्होंने बेटे की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आने दी। गौतम ने भी मां के संघर्ष को अपनी ताकत बनाया और नवोदय विद्यालय से पढ़ाई करते हुए आईआईटी मद्रास तक पहुंचे। इसके बाद संघ लोक सेवा आयोग की भारतीय वन सेवा परीक्षा में 139वीं रैंक हासिल कर अधिकारी बने। आज उनकी सफलता मां के त्याग और बेटे की मेहनत की प्रेरक कहानी बन गई है।

पिता के जाने के बाद मां ने उठाई पूरे परिवार की जिम्मेदारी

गौतम पाडीभर के जीवन में मुश्किलों का दौर बचपन से ही शुरू हो गया था। पिता के जाने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां के कंधों पर आ गई। मां पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन वह जानती थीं कि बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने के लिए शिक्षा कितनी जरूरी है। परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्होंने गांव में मजदूरी की और बाद में मुंबई की झुग्गी-बस्ती में रहकर कबाड़ बीनने तथा सड़कों से कचरा इकट्ठा करने का काम किया। आर्थिक तंगी के बावजूद उनकी कोशिश यही रही कि बच्चों को कम उम्र में मजदूरी करने के लिए मजबूर न होना पड़े। वह खुद तकलीफें सहती रहीं, ताकि उनके बच्चे पढ़-लिखकर अपने सपनों को पूरा कर सकें। गौतम ने अपनी सफलता की कहानी में मां के इसी त्याग और संघर्ष को सबसे बड़ी प्रेरणा बताया है।

नवोदय विद्यालय से शुरू हुआ आईआईटी मद्रास तक का सफर

गौतम की शिक्षा महाराष्ट्र के जालना स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय से आगे बढ़ी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई पर ध्यान बनाए रखा और बिना किसी औपचारिक कोचिंग के संयुक्त प्रवेश परीक्षा यानी जेईई पास की। इसके बाद उन्हें देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में शामिल आईआईटी मद्रास में पढ़ने का अवसर मिला। मुंबई की झुग्गी-बस्ती से निकलकर आईआईटी मद्रास तक पहुंचना उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी। इस सफर में उनकी मेहनत के साथ मां का भरोसा और प्रोत्साहन भी अहम रहा। उन्होंने साबित किया कि महंगे संसाधनों और कोचिंग की कमी के बावजूद लगन और निरंतर प्रयास से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।

इंजीनियरिंग के बाद यूपीएससी की तैयारी, हासिल की 139वीं रैंक

आईआईटी मद्रास से बीटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद गौतम ने सिविल सेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का फैसला किया। उन्होंने वर्ष 2022 की संघ लोक सेवा आयोग की भारतीय वन सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की और अखिल भारतीय स्तर पर 139वीं रैंक प्राप्त की। इसके बाद वह भारतीय वन सेवा के 2023 बैच में छत्तीसगढ़ कैडर के अधिकारी बने। उन्हें छत्तीसगढ़ के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के निदेशक के रूप में पदस्थ किया गया। इस तरह संघर्षों से भरे बचपन से शुरू हुआ उनका सफर देश की प्रतिष्ठित सेवा तक पहुंच गया।

मां की प्रेरणा को गौतम ने बताया सफलता की सबसे बड़ी वजह

गौतम ने अपनी कहानी साझा करते हुए बताया कि मुंबई की झुग्गियों से आईआईटी मद्रास तक पहुंचने के दौरान उनके पास न तो पर्याप्त संसाधन थे और न ही कोचिंग की सुविधा। इसके बावजूद मां ने उन्हें मेहनत करने, संघर्षों का सामना करने और बड़े सपने देखने का हौसला दिया। उनके मुताबिक, मां ने अपनी जिंदगी में तमाम कठिनाइयां झेलीं, लेकिन बच्चों के सपनों को कभी छोटा नहीं होने दिया। यही विश्वास गौतम के लिए आगे बढ़ने की ताकत बना। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय मां को देते हुए कहा कि वह आज जो कुछ भी हैं, उसमें उनकी मां का सबसे बड़ा योगदान है।

जब अधिकारी बेटे की कुर्सी पर बैठीं मां, भावुक कर गया वह पल

गौतम के लिए सबसे भावुक क्षणों में से एक वह था, जब उनकी मां उनसे मिलने कार्यालय पहुंचीं और उनकी आधिकारिक कुर्सी पर बैठीं। यह दृश्य उन वर्षों के संघर्ष की याद दिलाने वाला था, जब मां ने परिवार का पेट पालने के लिए मजदूरी की और कचरा बीनकर बच्चों की पढ़ाई जारी रखी। जिस मां ने कभी अभावों के बीच परिवार को संभाला था, उसी मां को अपने बेटे की सफलता और उपलब्धियों के बीच सम्मान के साथ बैठे देखना गौतम के लिए गर्व का क्षण था। उनकी कहानी बताती है कि किसी व्यक्ति की सफलता के पीछे अक्सर ऐसे त्याग छिपे होते हैं, जिन्हें दुनिया देख नहीं पाती। गौतम पाडीभर की उपलब्धि केवल एक परीक्षा में मिली रैंक या अधिकारी बनने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मां के संघर्ष, शिक्षा की ताकत और मुश्किल हालात में भी उम्मीद बनाए रखने की मिसाल है।