बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था में रेफरल सिस्टम को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं, लेकिन भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल (JLNMCH) से सामने आई तस्वीर ने पूरे सिस्टम की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। आमतौर पर गंभीर मरीजों को बेहतर इलाज के लिए बड़े अस्पतालों में रेफर किया जाता है, लेकिन अब हालात ऐसे बन गए हैं कि मृतकों के शव भी छोटे अस्पतालों से मेडिकल कॉलेज भेजे जा रहे हैं। नतीजा यह है कि पोस्टमार्टम हाउस में शवों की लंबी कतार लग रही है और मृतकों के परिजनों को अंतिम संस्कार से पहले कई-कई दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के उस संकट का प्रतीक है जिसमें जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति पूरे तंत्र पर भारी पड़ रही है।पोस्टमार्टम के इंतजार में बढ़ती कतार | फोटो: हिन्दुस्तान न्यूज वेबसाइट

छोटे अस्पतालों की कामचोरी ने बढ़ाया मेडिकल कॉलेज पर बोझ

जानकारी के अनुसार, अनुमंडल और जिला स्तर के कई अस्पताल ऐसे मामलों को भी ‘क्रिटिकल’ बताकर भागलपुर मेडिकल कॉलेज भेज रहे हैं, जिन्हें स्थानीय स्तर पर निपटाया जा सकता है। खासकर सड़ी-गली अवस्था में मिले शवों के पोस्टमार्टम से बचने के लिए कई डॉक्टर उन्हें सीधे जेएलएनएमसीएच रेफर कर देते हैं। नियम यह कहता है कि केवल विशेष परिस्थितियों वाले जटिल मामलों को ही मेडिकल कॉलेज भेजा जाना चाहिए, लेकिन व्यवहार में यह व्यवस्था उलट चुकी है। परिणामस्वरूप मेडिकल कॉलेज पर अनावश्यक दबाव बढ़ता जा रहा है और वहां उपलब्ध सीमित संसाधन तेजी से जवाब देने लगे हैं।

फॉरेंसिक विभाग में 14 पद स्वीकृत, काम कर रहे सिर्फ दो डॉक्टर

इस संकट की सबसे बड़ी वजह फॉरेंसिक मेडिसिन एंड साइंस विभाग में डॉक्टरों की भारी कमी बताई जा रही है। विभाग में कुल 14 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल दो डॉक्टर ही कार्यरत हैं, जिनमें एक संविदा पर नियुक्त हैं। हैरानी की बात यह है कि विभाग में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर जैसे महत्वपूर्ण पद वर्षों से खाली पड़े हैं। ऐसे में पोस्टमार्टम जैसे संवेदनशील कार्य के साथ-साथ मेडिकल छात्रों की पढ़ाई और प्रशिक्षण का पूरा भार भी इन्हीं दो डॉक्टरों पर आ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी आबादी और इतने व्यापक क्षेत्र की जरूरतों के मुकाबले यह संख्या बेहद अपर्याप्त है।

15 जिलों का दबाव, हर साल 1500 से अधिक पोस्टमार्टम

जेएलएनएमसीएच केवल भागलपुर जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के लगभग 15 जिलों से आने वाले मामलों का भी प्रमुख केंद्र है। अस्पताल के आंकड़ों के मुताबिक यहां हर साल करीब 1500 पोस्टमार्टम किए जाते हैं। इनमें बड़ी संख्या उन मामलों की होती है जो दूसरे जिलों से रेफर होकर आते हैं। नियमों के अनुसार मेडिकल कॉलेज में केवल विशेष जांच या स्केलेटल एग्जामिनेशन जैसे जटिल मामलों को भेजा जाना चाहिए, जिनकी संख्या सालाना 20-25 के आसपास होती है। लेकिन वर्तमान स्थिति में सामान्य पोस्टमार्टम केस भी बड़े पैमाने पर रेफर किए जा रहे हैं। इससे न केवल विभाग पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है बल्कि आम लोगों को भी अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

परिजन झेल रहे मानसिक पीड़ा, प्रशासनिक सुधार की जरूरत

पोस्टमार्टम में देरी का सबसे बड़ा असर मृतकों के परिवारों पर पड़ रहा है। कई मामलों में परिजनों को शव लेने और अंतिम संस्कार करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले परिवारों को आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन भी मानता है कि यह स्थिति सामान्य नहीं है। अस्पताल के प्राचार्य ने स्पष्ट कहा है कि डॉक्टरों की रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया जारी है, लेकिन साथ ही जिला और अनुमंडल स्तर के अस्पतालों को भी अपनी जिम्मेदारियां निभानी होंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेफरल सिस्टम को सख्ती से लागू नहीं किया गया और फॉरेंसिक विभाग में तत्काल नियुक्तियां नहीं हुईं, तो आने वाले समय में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है। बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए यह एक चेतावनी है कि केवल इमारतें और योजनाएं नहीं, बल्कि जिम्मेदार प्रशासन और पर्याप्त मानव संसाधन ही किसी व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं।