बिहार की सांस्कृतिक विरासत को एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिली है। राज्य के तीन पारंपरिक उत्पाद- नालंदा की बावन बूटी साड़ी एवं फैब्रिक, गया का पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग-को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है। यह सिर्फ एक कानूनी मान्यता नहीं, बल्कि उन हजारों बुनकरों, शिल्पकारों और लोक कलाकारों के दशकों पुराने संघर्ष, कौशल और परंपरा का सम्मान है, जिन्होंने आधुनिकता की दौड़ में भी अपनी कला को जीवित रखा। GI टैग मिलने के बाद अब इन उत्पादों की पहचान केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक बाजार में भी इन्हें एक विशिष्ट और प्रमाणिक ब्रांड के रूप में देखा जाएगा।बिहार के तीन उत्पादों को GI टैग | फोटो: न्यूज 18

सदियों पुरानी बुनाई कला को मिला नया जीवन

नालंदा की प्रसिद्ध बावन बूटी साड़ी बिहार की सबसे अनूठी वस्त्र कलाओं में गिनी जाती है। इस कला की खासियत कपड़ों पर हाथ से बुनी जाने वाली 52 प्रकार की पारंपरिक आकृतियां और प्रतीक हैं, जिनमें बौद्ध संस्कृति, प्रकृति और भारतीय परंपराओं की झलक दिखाई देती है। यह कला मुख्य रूप से नालंदा के बसवन बीघा और आसपास के क्षेत्रों में पीढ़ियों से संरक्षित है। बदलते समय और मशीनों की प्रतिस्पर्धा के कारण यह शिल्प धीरे-धीरे संकट में पड़ रहा था, लेकिन GI टैग मिलने से इसे नई पहचान और बाजार मिलने की उम्मीद जगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे स्थानीय बुनकरों की आय बढ़ेगी और युवा पीढ़ी भी इस पारंपरिक कला से जुड़ने के लिए प्रेरित होगी।

300 साल पुरानी पत्थरकट्टी शिल्पकला को मिला सम्मान

गया जिले का पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट बिहार की ऐतिहासिक शिल्प परंपरा का जीवंत उदाहरण है। लगभग तीन सौ वर्ष पुरानी इस कला में स्थानीय काले ग्रेनाइट पत्थरों पर बारीक नक्काशी कर भगवान बुद्ध, देवी-देवताओं और सांस्कृतिक प्रतीकों की मूर्तियां तैयार की जाती हैं। पत्थरकट्टी गांव लंबे समय से देशभर में अपनी उत्कृष्ट शिल्पकला के लिए जाना जाता रहा है। हालांकि, आधुनिक बाजार और सीमित पहचान के कारण कारीगरों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। GI टैग मिलने के बाद अब इस कला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिलने की संभावना है, जिससे कारीगरों को बेहतर बाजार और रोजगार के अवसर मिल सकते हैं।

ग्रामीण संस्कृति की आत्मा है पिढ़िया पेंटिंग

भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग बिहार की लोक परंपरा और ग्रामीण जीवन की कहानी कहती है। यह कला मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा त्योहारों, मांगलिक अवसरों और पारिवारिक आयोजनों में बनाई जाती है। प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से इसमें सामाजिक रिश्तों, लोक आस्थाओं और ग्रामीण जीवन के विविध रंगों को उकेरा जाता है। लंबे समय तक यह कला घरों की दीवारों और आंगनों तक सीमित रही, लेकिन अब GI टैग मिलने के बाद इसे वैश्विक पहचान मिलने का रास्ता खुल गया है। कला विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बिहार की लोक कला को नया संरक्षण मिलेगा और महिला कलाकारों को आर्थिक रूप से भी लाभ होगा।

बिहार की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान को मिलेगा नया बल

GI टैग केवल पहचान का प्रमाण पत्र नहीं होता, बल्कि यह किसी उत्पाद की विशिष्टता और उसकी भौगोलिक उत्पत्ति की कानूनी सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगती है और असली उत्पादों को बाजार में बेहतर मूल्य मिलता है। बिहार को इससे पहले शाही लीची, जर्दालू आम, मर्चा धान चिउड़ा, मगही पान और मिथिला मखाना जैसे उत्पादों के लिए GI टैग मिल चुका है। अब इन तीन नई उपलब्धियों के साथ बिहार की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान और मजबूत हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार और संबंधित संस्थाएं इन उत्पादों की ब्रांडिंग, मार्केटिंग और निर्यात पर ध्यान दें, तो यह न केवल राज्य की अर्थव्यवस्था को गति देगा बल्कि बिहार की समृद्ध विरासत को दुनिया भर में नई प्रतिष्ठा भी दिलाएगा।