बिहार में अवैध खनन और बालू माफियाओं की गतिविधियां कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन इस बार सामने आया मामला पारंपरिक अवैध खनन से कहीं अधिक खतरनाक और तकनीकी रूप से संगठित बताया जा रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार, राज्य सरकार के खनन विभाग के आधिकारिक ‘खननसॉफ्ट’ पोर्टल में कथित तौर पर छेड़छाड़ कर लगभग 350 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान पहुंचाया गया। इस पूरे मामले ने सरकारी डिजिटल सिस्टम की सुरक्षा, प्रशासनिक निगरानी और तकनीकी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) अब इस हाईटेक घोटाले की तह तक पहुंचने के लिए व्यापक जांच में जुटी है, जबकि शुरुआती निष्कर्षों ने कई चौंकाने वाले संकेत दिए हैं।
कैसे हुआ खेल? सॉफ्टवेयर में छेड़छाड़ कर बढ़ाई गई बालू की सीमा
जांच में सामने आया है कि खनन विभाग द्वारा लाइसेंसधारकों को बालू खनन और बिक्री के लिए एक निर्धारित सीमा आवंटित की जाती है, जिसकी निगरानी ‘खननसॉफ्ट’ पोर्टल के माध्यम से की जाती है। आरोप है कि कुछ तकनीकी जानकार लोगों और कथित रूप से सिस्टम तक पहुंच रखने वाले व्यक्तियों ने इस डिजिटल व्यवस्था में सेंध लगाकर लाइसेंसधारकों की निर्धारित सीमा को अवैध रूप से बढ़ा दिया। सबसे गंभीर बात यह है कि सुरक्षा की महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाने वाली ओटीपी सत्यापन व्यवस्था को भी कथित तौर पर निष्क्रिय या बाईपास कर दिया गया। इसके बाद कई दस्तावेज बिना वैधानिक स्वीकृति के पोर्टल पर अपलोड किए गए और कागजों में बालू की उपलब्ध मात्रा बढ़ाकर वास्तविक सीमा से कहीं अधिक खनन और बिक्री दिखाई गई। इसी प्रक्रिया के जरिए सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर कर करोड़ों रुपये के राजस्व की चोरी की गई।
एनआईसी कर्मियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि जांच एजेंसियों को सरकारी तकनीकी ढांचे के भीतर से मिलीभगत की आशंका भी नजर आ रही है। ईओयू की प्रारंभिक जांच के अनुसार, खनन विभाग में प्रतिनियुक्त राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) से जुड़े कुछ कर्मियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। आरोप है कि मुख्य डेटाबेस सर्वर और सॉफ्टवेयर संरचना में बदलाव बिना तकनीकी सहयोग के संभव नहीं था। हालांकि अभी किसी व्यक्ति को अंतिम रूप से दोषी घोषित नहीं किया गया है, लेकिन जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि पोर्टल के लॉग-इन, पासवर्ड, प्रशासनिक अधिकार और सर्वर एक्सेस किन लोगों के नियंत्रण में थे। यही वजह है कि मामले को केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा से जुड़ा गंभीर अपराध भी माना जा रहा है।
17 जिलों में 62 मामले दर्ज, 100 से अधिक लाइसेंसधारी जांच के घेरे में
घोटाले का दायरा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। अब तक राज्य के 17 जिलों में इस मामले से जुड़े 62 आपराधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। पटना साइबर थाना सहित विभिन्न जिलों की पुलिस और आर्थिक अपराध इकाई संयुक्त रूप से जांच कर रही है। जांच एजेंसियों के रडार पर 100 से अधिक लाइसेंसधारी बताए जा रहे हैं, जिन पर निर्धारित सीमा से अधिक बालू उठाव और बिक्री करने का संदेह है। अधिकारियों का मानना है कि यह कोई एक-दो व्यक्तियों का काम नहीं, बल्कि कई स्तरों पर फैला हुआ एक संगठित नेटवर्क हो सकता है, जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ, लाइसेंसधारी कारोबारी और कुछ प्रभावशाली लोग शामिल हो सकते हैं। इसी कारण जांच को बहुआयामी बनाया गया है।
टेक्निकल ऑडिट से खुलेंगे राज, कई बड़े नाम आ सकते हैं सामने
ईओयू के डीआईजी मानवजीत सिंह ढिल्लो के अनुसार, पूरे मामले का तकनीकी ऑडिट कराया जा रहा है। इसके लिए बिहार स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (बेल्ट्रॉन) के साथ-साथ केंद्र सरकार की विशेषज्ञ एजेंसियों की भी मदद ली जा रही है। ऑडिट रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि पोर्टल में छेड़छाड़ कब, कैसे और किन लोगों की मदद से की गई। जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि डिजिटल लॉग, सर्वर गतिविधियों और डेटा विश्लेषण के आधार पर जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान की जा सकेगी। यदि आरोप साबित होते हैं तो यह बिहार के सबसे बड़े डिजिटल राजस्व घोटालों में से एक माना जा सकता है। आने वाले दिनों में इस जांच से जुड़े और भी बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है, जिनका असर प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर दिखाई दे सकता है।
