__असगर अली अंसारी __

भारत में अक्सर कहा जाता है कि शिक्षा समाज को बदल देगी। जो पढ़ा-लिखा है, जो ग्रेजुएट है, जो अधिकारी है, उसे अधिक समझदार और ईमानदार माना जाता है। लेकिन आज गांव की चौपाल से लेकर जिले की कचहरी तक एक ही सवाल गूंज रहा है - क्या आज भारत में शोषण का रूप बदल गया है?
पढ़े-लिखे तंत्र का आम आदमी पर शोषण - प्रधान से लेकर मंत्री तक एक ही कहानीSource : AI Made
पहले कहा जाता था कि एक विशेष जाति दूसरी जाति का शोषण करती है। आज वह परिभाषा बदल गई है। आज शोषण जाति नहीं, पद और कलम करता है। आज का पढ़ा-लिखा वर्ग ही अपने ही देशवासियों का सबसे बड़ा शोषक बन गया है। और इस शोषण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह अकेले नहीं होता। इसमें गांव के प्रधान से लेकर दिल्ली के मंत्री तक और बाबू से लेकर कलेक्टर तक सब एक ही माला में पिरोए हुए हैं।
1. गांव का प्रधान - भ्रष्टाचार की पहली पाठशाला
सब कुछ यहीं से शुरू होता है। आज प्रधान का चुनाव सेवा के लिए नहीं, निवेश के लिए लड़ा जाता है। 10-15 लाख खर्च करके प्रधान बनना आम बात है, फिर वसूली शुरू होती है।
आवास योजना में सरकार 1.20 लाख भेजती है तो लाभार्थी को 80-90 हजार ही मिलता है। शौचालय, पेंशन, राशन कार्ड में 500 से 2000 रुपये फिक्स हैं। मनरेगा में कागज पर 100 मजदूर और जमीन पर 20 मजदूर। नाली-खड़ंजा हर साल कागज पर ही बनता है। 5 साल में एक प्रधान बिना कोई धंधा किए 50 लाख से 1 करोड़ की संपत्ति बना लेता है।
2. ब्लॉक और तहसील - जहाँ आम आदमी रोज लुटता है
जिला छोड़कर ब्लॉक पर आइए। यहाँ आम आदमी का रोज का काम पड़ता है। आय प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, निवास, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र - बिना 200 से 1000 रुपये दिए कोई कागज नहीं बनता। सरकारी फीस 20 रुपये है तो दलाल 500 रुपये लेता है। लेखपाल, बाबू और सचिव का एक रेट तय है।
यहीं पर ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत का खेल शुरू होता है। सड़क, नाली, स्कूल की बिल्डिंग के हर टेंडर में 10 से 15 प्रतिशत कमीशन बंधा है। जो सड़क कागज पर 9 इंच मोटी है, जमीन पर 4 इंच ही रह जाती है।
3. जिला प्रशासन - विकास के पैसे में बंदरबांट
जिले में कलेक्टर और जिला स्तरीय अधिकारी बैठते हैं। सरकार विकास के लिए करोड़ों भेजती है, पर वह पैसा 100 प्रतिशत कभी जमीन पर नहीं पहुंचता। ऊपर से नीचे तक कमीशन का अलिखित नियम है। ठेकेदार को बिल पास कराने के लिए जेई से लेकर अधिशासी अभियंता तक को चढ़ावा देना पड़ता है। यही पैसा अंत में विधायक और मंत्री तक जाता है।
4. अस्पताल और शिक्षा - जहाँ सेवा बिकती है
सरकारी अस्पताल में डॉक्टर समय पर नहीं, दवाइयां बाहर से लिखी जाती हैं, जांच निजी लैब से करवाई जाती है क्योंकि वहां से कमीशन बंधा है। प्रसव के लिए आई गरीब महिला से भी पैसे मांगे जाते हैं।
शिक्षा का हाल सबसे दर्दनाक है। शिक्षक को पढ़ाने का समय ही नहीं मिलता। मिड-डे मील में राशन-सब्जी का हिसाब, किताबें-ड्रेस बांटना, आधार फीडिंग, चुनाव ड्यूटी, बीएलओ ड्यूटी और दर्जनों ऐप पर फोटो अपलोड करना - कागजों का बोझ इतना है कि बच्चों को पढ़ाने का समय ही नहीं बचता। आजादी के 75 साल बाद भी हम अपने बच्चों को एक ऐसा भवन नहीं दे पाए जहां वह ठीक से बैठकर पढ़ सके। यह इस पढ़े-लिखे तंत्र की सबसे बड़ी हार है।
5. पुलिस और अदालत - न्याय की बोली
थाने में बिना पैसे के एफआईआर तक दर्ज नहीं होती। छोटे से छोटे मामले में सिपाही से लेकर थानेदार तक का रेट है। और अदालत में तारीख पर तारीख। वकील की फीस, स्टाम्प, नकल - न्याय मिलने से पहले ही आदमी टूट जाता है।
6. विधायक, सांसद और मंत्री - जहाँ हजारों करोड़ का खेल है
यहां से खेल करोड़ों से अरबों में बदल जाता है।
विधायक-सांसद का फंडा: विधायक निधि और सांसद निधि के करोड़ों रुपये अपने चहेते ठेकेदारों को देकर 25 प्रतिशत कमीशन। सबसे बड़ा धंधा है ट्रांसफर-पोस्टिंग उद्योग। थानेदार, तहसीलदार, बीडीओ की मलाईदार पोस्ट की बोली लगती है।
मंत्री का दरबार: मंत्री बनते ही फाइल ही नोटों की मशीन बन जाती है। बड़े-बड़े टेंडर, शराब-खदान-फैक्ट्री के लाइसेंस, जमीन के लैंड यूज बदलने में एक-एक दस्तखत पर करोड़ों का खेल होता है। इसीलिए आप देखते हैं कि चुनाव से पहले जो व्यक्ति साधारण घर में रहता था, 5 साल बाद उसके पास फार्म हाउस, दिल्ली में फ्लैट, पेट्रोल पंप, स्कूल-कॉलेज और उसके रिश्तेदारों के नाम सैकड़ों बीघा जमीन हो जाती है। पैसा कभी अपने नाम पर नहीं होता, हमेशा बेनामी होता है।
अंत में - यह सिस्टम कैसे टूटेगा?
यह किसी एक व्यक्ति का भ्रष्टाचार नहीं है, यह एक पूरा सिस्टम है। नीचे प्रधान लूटता है और ऊपर मंत्री तक हिस्सा पहुंचाता है, ऊपर मंत्री ट्रांसफर-पोस्टिंग से कमाता है और नीचे प्रधान को बचाता है। अधिकारी बीच में बिचौलिए का काम करता है।
एक वक्त था जब अनपढ़ लोग कहते थे कि पढ़-लिखकर हमारा समाज सुधरेगा। आज वही पढ़ा-लिखा तबका अनपढ़ से भी ज्यादा चालाक बनकर अपने ही लोगों का शोषण कर रहा है। समाज का कोई ऐसा फील्ड नहीं बचा जहां बिना रिश्वत के काम चल रहा हो।
जब तक प्रधान से लेकर मंत्री तक की संपत्ति की हर साल सार्वजनिक और पारदर्शी जांच नहीं होगी, जब तक हर योजना का पैसा और हर फाइल का हिसाब ऑनलाइन जनता के सामने नहीं आएगा, तब तक यह शोषण जारी रहेगा। असली आजादी उस दिन होगी, जब एक गरीब आदमी बिना एक रुपया दिए अपना प्रमाण पत्र बनवा सकेगा और उसका बच्चा एक अच्छे भवन में बैठकर पढ़ सकेगा।
