ere | Source: rerनई दिल्ली। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी SC/ST Act में अग्रिम जमानत और गिरफ्तारी से जुड़े कड़े प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में उठाया गया सवाल फिलहाल आगे नहीं बढ़ सका। 22 सितंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि इस कानून के संभावित दुरुपयोग से निपटने के लिए न्यायिक स्तर पर पर्याप्त सुरक्षा उपाय पहले से मौजूद हैं।

अग्रिम जमानत के सवाल पर कोर्ट ने क्यों कहा-यह संसद का फैसला है

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने SC/ST Act के तहत आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ न मिलने के प्रावधान पर सवाल उठाया और इसे संविधान के अनुच्छेद 21 से जोड़ते हुए दलील रखी। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि ऐसे प्रावधानों को तय करना विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका संसद द्वारा बनाए गए कानून की जगह अपनी व्यवस्था लागू नहीं कर सकती।

जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठाया कि कुछ विशेष कानूनों में सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों के बावजूद अग्रिम जमानत पर कड़ी पाबंदियां क्यों हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि यह नीतिगत निर्णय विधायिका ने कानून बनाते समय लिया है और अदालत उसके स्थान पर निर्णय नहीं ले सकती।

2018 के संशोधन में आखिर बदला क्या था?

संसद ने वर्ष 2018 में SC/ST Act में संशोधन करते हुए धारा 18A जोड़ी थी। इसके तहत SC/ST Act के मामलों में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता को समाप्त किया गया। साथ ही आरोपी की गिरफ्तारी से पहले किसी सक्षम अधिकारी से अनुमति लेने की व्यवस्था भी हटा दी गई।

इसी संशोधन के जरिए इस अधिनियम के मामलों में अग्रिम जमानत पर मौजूद रोक को फिर से प्रभावी बनाया गया। इन बदलावों को लेकर समय-समय पर कानून के दुरुपयोग और आरोपी के अधिकारों से जुड़े सवाल अदालतों में उठते रहे हैं।

2020 में सुप्रीम कोर्ट पहले ही दे चुका है फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में ‘पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ’ मामले में 2018 के संशोधन की संवैधानिक वैधता पर विचार किया था। मौजूदा सुनवाई में पीठ ने इसी पुराने फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि तीन जजों की पीठ पहले ही संबंधित प्रावधानों को बरकरार रख चुकी है।

याचिकाकर्ता की ओर से उस फैसले पर दोबारा विचार करने का आग्रह किया गया, लेकिन पीठ ने इसे स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि किसी प्रावधान के संभावित गलत इस्तेमाल के उदाहरण सामने आने से उस कानून की संवैधानिक वैधता पर दोबारा विचार करने का आधार अपने आप नहीं बन जाता।

गलत तरीके से फंसाए जाने की स्थिति में भी न्यायिक रास्ता खुला

सुनवाई के दौरान पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि यदि किसी व्यक्ति को SC/ST Act के तहत गलत तरीके से आरोपी बनाया गया है, तो न्यायालय के पास मामले की परिस्थितियों की जांच करने के रास्ते मौजूद हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कानून के दुरुपयोग की संभावना अपने आप में पूरे कानून को असंवैधानिक नहीं बना देती।

पीठ के अनुसार अदालतें यह देख सकती हैं कि FIR और उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं। परिस्थितियों के आधार पर उपयुक्त न्यायिक राहत का रास्ता भी खुला रहता है।

BNSS की धारा 35 पर भी अदालत ने दिया जोर

जस्टिस बागची ने गिरफ्तारी से जुड़े मौजूदा कानूनी प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी विशेष कानून के तहत गिरफ्तारी के मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 35 के प्रावधानों को भी ध्यान में रखना होगा।

उन्होंने अर्नेश कुमार मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गिरफ्तारी से संबंधित दिशा-निर्देशों की ओर भी ध्यान दिलाया। अदालत की टिप्पणी का आशय था कि विशेष कानून लागू होने के बावजूद गिरफ्तारी की प्रक्रिया से जुड़े सामान्य न्यायिक सिद्धांतों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

‘उल्टा भेदभाव’ की दलील पर भी नहीं बदला अदालत का रुख

याचिकाकर्ता के वकील ने 2018 के संशोधन को ‘उल्टा भेदभाव’ बताते हुए दलील दी कि इससे समाज में विभाजन की स्थिति बढ़ सकती है। इस पर पीठ ने कहा कि ऐसी आशंकाओं पर 2020 के फैसले में पहले ही विचार किया जा चुका है।

अदालत ने यह भी दोहराया कि SC/ST Act की धारा 18A मौजूद होने के बावजूद न्यायालय के पास किसी मामले की वास्तविक परिस्थितियों की जांच करने का अधिकार बना रहता है। यदि किसी मामले में प्रथम दृष्टया अपराध का आधार नहीं मिलता है, तो अदालत उचित राहत पर विचार कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज कर दी?

सुनवाई के अंत में पीठ ने 2018 के संशोधन को दोबारा चुनौती देने वाली याचिका को आगे सुनने से इनकार कर दिया। अदालत का रुख यह रहा कि संबंधित प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर पहले ही फैसला हो चुका है और दुरुपयोग की शिकायतों से निपटने के लिए न्यायिक सुरक्षा उपाय उपलब्ध हैं।

इस तरह SC/ST Act में अग्रिम जमानत की पाबंदी और गिरफ्तारी से जुड़े 2018 के संशोधन को लेकर तत्काल कोई नया बदलाव नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में बदलाव या उसकी नीति पर पुनर्विचार का सवाल विधायिका के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है, जबकि अदालतें मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत न्यायिक राहत उपलब्ध करा सकती हैं।