4343 | Source: 34343नई दिल्ली। भारत में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद नई दिल्ली घोषणापत्र वैश्विक चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के बीच साझा घोषणापत्र पर सहमति बनना भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। खास बात यह है कि इससे पहले ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका था। ऐसे में नई दिल्ली घोषणापत्र पर बनी सहमति ने भारत की कूटनीतिक क्षमता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा है।

नई दिल्ली घोषणापत्र में किन मुद्दों पर बनी सहमति?

नई दिल्ली घोषणापत्र में पश्चिम एशिया के संघर्ष का उल्लेख सावधानीपूर्ण और संतुलित कूटनीतिक भाषा में किया गया है। इसमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के अनुरूप आम लोगों से जुड़े बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की अपील की गई है।

घोषणापत्र में विवादों के समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। इसके अलावा ब्रिक्स सदस्य देशों ने व्यापार, आपूर्ति और ऊर्जा सहित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है। इन मुद्दों पर बनी सहमति को सम्मेलन के प्रमुख परिणामों में गिना जा रहा है।

विदेशी मीडिया में भारत और प्रधानमंत्री मोदी की चर्चा

नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन और घोषणापत्र को लेकर विदेशी मीडिया में भी व्यापक चर्चा देखने को मिली। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने सम्मेलन के अलग-अलग पहलुओं को प्रमुखता दी। इनमें भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका, ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग, भारत-चीन संबंध और बदलती वैश्विक व्यवस्था जैसे मुद्दे शामिल रहे।

विदेशी मीडिया की रिपोर्टों में नई दिल्ली घोषणापत्र को ब्रिक्स के भीतर सहयोग और साझा रुख की दिशा में महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में रेखांकित किया गया है। सम्मेलन की चर्चा में भारत की मेजबानी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक सक्रियता भी प्रमुखता से सामने आई।

द वाशिंगटन पोस्ट ने भारत-चीन रिश्तों पर किया फोकस

द वाशिंगटन पोस्ट ने ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात तथा दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की कोशिशों को प्रमुखता दी। रिपोर्ट में भारत और चीन के संबंधों में पहले आए तनाव के बाद हुई प्रगति की ओर ध्यान दिलाया गया।

भारत और चीन के बीच संबंधों को लेकर यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों के बीच पहले सीमा को लेकर तनाव की स्थिति रही है। ऐसे में दोनों नेताओं की बातचीत और संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिशों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित किया।

ग्लोबल टाइम्स ने ब्रिक्स को बताया उभरती वैश्विक ताकत

ग्लोबल टाइम्स ने मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में ब्रिक्स की भूमिका और उसकी बढ़ती ताकत को रेखांकित किया। उसकी रिपोर्ट में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को ग्लोबल साउथ की उभरती हुई ताकत के रूप में पेश किया गया।

ब्रिक्स के मंच पर अलग-अलग देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की कोशिशों और वैश्विक मुद्दों पर साझा रुख को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नई दिल्ली सम्मेलन ने इस बहुपक्षीय समूह की भूमिका को लेकर चर्चा को और तेज किया है।

अल जजीरा ने अमेरिका की व्यापार नीति का किया जिक्र

अल जजीरा की रिपोर्ट में ब्रिक्स सम्मेलन के समय की वैश्विक व्यापारिक परिस्थितियों पर ध्यान केंद्रित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, यह सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब अमेरिका की ओर से वैश्विक व्यापार पर शुल्क और प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं।

रिपोर्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक व्यापारिक नीतियों को ब्रिक्स देशों के लिए एक तरह के ‘भर्ती एजेंट’ के रूप में भी प्रस्तुत किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में बदलती परिस्थितियां ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय समूहों की प्रासंगिकता को प्रभावित कर रही हैं।

द न्यूयॉर्क टाइम्स की नजर ईरान और तेल कीमतों पर

द न्यूयॉर्क टाइम्स ने ब्रिक्स सम्मेलन में ईरान की मौजूदगी और बढ़ती तेल कीमतों के बीच इसके महत्व को रेखांकित किया। रिपोर्ट में इस बात पर ध्यान दिया गया कि सम्मेलन ने चीन, भारत और रूस के नेताओं को ईरान के साथ एक ही मंच पर आने का अवसर दिया।

ऊर्जा और पश्चिम एशिया से जुड़े घटनाक्रमों के बीच ब्रिक्स सम्मेलन में ईरान की मौजूदगी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा गया। इससे सम्मेलन की चर्चा केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यापक वैश्विक रणनीतिक मुद्दों तक पहुंची।

शी जिनपिंग ने भारत-चीन संबंधों के लिए रखा चार सूत्रीय फॉर्मूला

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत और चीन के संबंधों को लेकर चार सूत्रीय फॉर्मूला पेश किया। इसमें दोनों देशों के बीच रणनीतिक समझ, पारस्परिक लाभ, सम्मान और बहुपक्षीय सहयोग को महत्व दिया गया।

पहला—रणनीतिक समझ: शी जिनपिंग ने कहा कि भारत और चीन को एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने दोनों देशों के विकास को एक-दूसरे के लिए खतरे के बजाय अवसर के रूप में देखने की बात कही।

दूसरा—परस्पर लाभ वाला सहयोग: दोनों देशों के विकास को साझा आधार बताते हुए जिनपिंग ने मित्रतापूर्ण संपर्क बढ़ाने और पारस्परिक लाभ वाले सहयोग को मजबूत करने की वकालत की।

तीसरा—पारस्परिक सम्मान: भारत और चीन के बीच सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति तथा स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया गया।

चौथा—बहुपक्षीय सहयोग: चीन ने ब्रिक्स अध्यक्षता के समर्थन के साथ संयुक्त राष्ट्र, एससीओ और जी-20 जैसे बहुपक्षीय मंचों पर दोनों देशों के बीच सहयोग मजबूत करने का आह्वान किया।

स्थानीय मुद्रा में व्यापार पर भी जोर

नई दिल्ली घोषणापत्र में द्विपक्षीय व्यापार को स्थानीय मुद्राओं में करने पर जोर दिया गया है। इससे ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में समूह की प्राथमिकता सामने आती है।

घोषणापत्र में स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग मजबूत करने की बात भी कही गई है। इसके अलावा संगठित ठगी करने वाले नेटवर्कों को समाप्त करने और अवैध धन का पता लगाने के लिए समन्वित अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई का संकल्प लिया गया है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जोखिम पर भी चिंता

ब्रिक्स देशों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े जोखिमों को कम करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया है। तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते इस्तेमाल के बीच इससे जुड़े जोखिमों को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत को रेखांकित किया गया।

इस तरह नई दिल्ली घोषणापत्र में आर्थिक सहयोग, स्वास्थ्य, ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा, तकनीक और वैश्विक कूटनीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों को जगह मिली है।

नई दिल्ली सम्मेलन से भारत को क्या मिला?

ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी और नई दिल्ली घोषणापत्र पर सदस्य देशों की सहमति ने भारत को वैश्विक कूटनीति के केंद्र में ला दिया है। सम्मेलन के दौरान अलग-अलग देशों के नेताओं के साथ संवाद, भारत-चीन संबंधों को लेकर सामने आए संकेत और वैश्विक आर्थिक एवं रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा ने इसकी अहमियत बढ़ाई।

विदेशी मीडिया की अलग-अलग रिपोर्टों में सम्मेलन के विभिन्न पहलुओं को जिस तरह प्रमुखता दी गई, उससे यह स्पष्ट है कि नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स बैठक का प्रभाव केवल सदस्य देशों तक सीमित नहीं रहा। भारत की अध्यक्षता में हुए सम्मेलन ने बदलती वैश्विक व्यवस्था, ग्लोबल साउथ की भूमिका और बहुपक्षीय सहयोग जैसे विषयों पर अंतरराष्ट्रीय बहस को भी गति दी है।