नई दिल्ली। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता एक बार फिर बढ़ गई है। Environmental Research Letters में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, प्राकृतिक प्रक्रियाओं से बनने वाले ‘फीडबैक लूप’ भविष्य में वैश्विक तापमान बढ़ने की रफ्तार को और तेज कर सकते हैं। अध्ययन के मुताबिक, इन प्राकृतिक स्रोतों को पूरी तरह ध्यान में रखने पर इस सदी के अंत तक वैश्विक हीटिंग में 20 से 30 प्रतिशत तक अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। इससे औसत वैश्विक तापमान में करीब 0.2 से 0.4 डिग्री सेल्सियस तक अतिरिक्त बढ़ोतरी होने का अनुमान जताया गया है।
इंसानी प्रदूषण के बाद प्रकृति भी बढ़ा सकती है गर्मी
अब तक ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा मुख्य रूप से मानव गतिविधियों, जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल और उनसे निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के संदर्भ में होती रही है। लेकिन वैज्ञानिकों का ध्यान उन प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर भी है, जिनके कारण तापमान बढ़ने के बाद प्रकृति के भीतर मौजूद कार्बन और मीथेन जैसे तत्व वातावरण में और अधिक मात्रा में पहुंच सकते हैं।
यही प्रक्रिया जलवायु परिवर्तन को और तेज कर सकती है। यानी तापमान बढ़ने से ऐसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं सक्रिय हो सकती हैं, जो वातावरण में अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैसें छोड़ें और इसके परिणामस्वरूप तापमान बढ़ने की प्रक्रिया आगे और मजबूत हो। वैज्ञानिक भाषा में इसी तरह के चक्र को ‘फीडबैक लूप’ कहा जाता है।
मिट्टी, वनस्पति और झीलों में छिपी गैसें बन सकती हैं चिंता
अध्ययन में जिन प्राकृतिक प्रक्रियाओं को महत्वपूर्ण माना गया है, उनमें मिट्टी, पेड़-पौधों और झीलों जैसे प्राकृतिक तंत्रों में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन का वातावरण में अधिक मात्रा में पहुंचना शामिल है। तापमान में बढ़ोतरी और पर्यावरणीय बदलाव इन प्राकृतिक स्रोतों से गैसों के उत्सर्जन को प्रभावित कर सकते हैं।
कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन दोनों ही ग्रीनहाउस गैसें हैं। वातावरण में इनकी मात्रा बढ़ने से पृथ्वी की गर्मी को बाहर निकलने में बाधा पहुंचती है और इसके कारण तापमान बढ़ने की प्रक्रिया को अतिरिक्त गति मिल सकती है।
जलवायु मॉडल में प्राकृतिक फीडबैक को लेकर उठे सवाल
वैज्ञानिक लंबे समय से विभिन्न प्राकृतिक फीडबैक प्रक्रियाओं के बारे में जानते हैं। हालांकि, अध्ययन के अनुसार वर्तमान जलवायु मॉडल और अंतरराष्ट्रीय जलवायु नीतियों में इन सभी प्रक्रियाओं का प्रभाव पूरी तरह शामिल नहीं किया गया था। नए शोध में इन प्राकृतिक स्रोतों के संभावित योगदान को भी वैश्विक तापमान के आकलन में महत्वपूर्ण माना गया है।
शोध के अनुसार, यदि प्राकृतिक स्रोतों से होने वाले अतिरिक्त प्रभाव को शामिल किया जाए तो इस सदी के अंत तक वैश्विक हीटिंग में 20 से 30 प्रतिशत तक अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। इसका मतलब औसत वैश्विक तापमान में 0.2 से 0.4 डिग्री सेल्सियस तक अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है।
सिर्फ 0.2 से 0.4 डिग्री की वृद्धि क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
पहली नजर में 0.2 या 0.4 डिग्री सेल्सियस की अतिरिक्त वृद्धि बहुत छोटी लग सकती है, लेकिन वैश्विक जलवायु के संदर्भ में तापमान में इतनी वृद्धि भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ने के साथ अत्यधिक गर्मी, लू, सूखा और भारी बारिश जैसी चरम मौसम घटनाओं के जोखिम पर असर पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल तापमान तक सीमित नहीं रहता। तापमान में बदलाव समुद्र, हिम क्षेत्र, वर्षा के पैटर्न, कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र जैसी कई प्राकृतिक प्रणालियों को भी प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक वैश्विक औसत तापमान में छोटी बढ़ोतरी को भी गंभीरता से लेते हैं।
1.5 डिग्री का लक्ष्य क्यों बना हुआ है बड़ी चुनौती?
वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित रखने का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय जलवायु नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े जलवायु प्रयासों में औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने पर विशेष जोर दिया गया है।
हालांकि, बढ़ते उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन की मौजूदा गति के बीच इस लक्ष्य को हासिल करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। अध्ययन में प्राकृतिक फीडबैक प्रक्रियाओं को भी इसी व्यापक चुनौती से जोड़कर देखा गया है।
वर्तमान नीतियों पर भी उठ रहे हैं सवाल
क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर के अनुमान के अनुसार, मौजूदा सरकारी नीतियों के आधार पर दुनिया के औसत तापमान में इस सदी के दौरान 2.6 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। यदि ऐसा होता है तो जलवायु परिवर्तन का प्रभाव दुनिया की बड़ी आबादी पर पड़ सकता है।
यह अनुमान इस बात की ओर भी संकेत करता है कि केवल भविष्य के लिए लक्ष्य तय करना पर्याप्त नहीं है। उत्सर्जन में वास्तविक और तेज कमी लाने के लिए देशों की नीतियों तथा ऊर्जा व्यवस्था में ठोस बदलाव की आवश्यकता होगी।
क्या इंसान इस बढ़ती गर्मी की रफ्तार रोक सकता है?
वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन की गति को नियंत्रित करने के लिए जीवाश्म ईंधनों से होने वाले उत्सर्जन में तेजी से और बड़े स्तर पर कटौती करना महत्वपूर्ण है। पेट्रोल, डीजल और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
यदि मानवजनित उत्सर्जन को तेजी से कम किया जाता है तो प्राकृतिक स्रोतों से होने वाली अतिरिक्त वार्मिंग के प्रभाव को भी सीमित करने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही जलवायु मॉडल में प्राकृतिक फीडबैक प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से शामिल करना जरूरी माना जा रहा है, ताकि भविष्य के तापमान और जलवायु जोखिमों का आकलन अधिक व्यापक तरीके से किया जा सके।
जलवायु नीति में बदलनी होगी रणनीति
नए अध्ययन से सामने आने वाली प्रमुख चिंता यह है कि जलवायु परिवर्तन केवल मानव गतिविधियों से होने वाले प्रत्यक्ष उत्सर्जन तक सीमित विषय नहीं है। तापमान में बदलाव स्वयं प्रकृति के भीतर ऐसी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है, जिनसे अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में पहुंच सकती हैं।
इसी कारण वैज्ञानिकों के लिए भविष्य की जलवायु गणनाओं में प्राकृतिक फीडबैक का सही आकलन महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे सरकारों और नीति निर्माताओं को उत्सर्जन कम करने तथा जलवायु जोखिमों से निपटने की रणनीति तैयार करने में बेहतर आधार मिल सकता है।
