नई दिल्ली। दिल्ली में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की जांच के लिए गठित पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड एनक्वायरी कमेटी (HPEC) की शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की। शीर्ष अदालत ने कहा कि समिति किसी व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती। प्रदर्शन से जुड़े मामलों में नई FIR दर्ज कराने का अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट के पास है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह स्पष्ट किया। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि HPEC प्रदर्शन से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र जांच कर सकती है, पीड़ितों की पहचान कर सकती है और अपनी सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट के सामने रख सकती है, लेकिन आपराधिक जांच शुरू करने के लिए FIR दर्ज कराने का निर्देश देने की शक्ति उसके पास नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम करेगी समिति
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समिति को सीधे अदालत की निगरानी में काम करना होगा। जांच के दौरान समिति के सामने यदि किसी तरह की समस्या या कानूनी अड़चन आती है, तो वह उसे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रख सकती है और शीर्ष अदालत आवश्यक कदम उठाएगी। अदालत ने समिति को अपनी सहायता के लिए अमिकस या वकील नियुक्त करने की अनुमति भी दी है।
इससे स्पष्ट है कि HPEC को जांच के लिए व्यापक अधिकार दिए गए हैं, लेकिन आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की अंतिम शक्ति अदालत के पास ही रहेगी। समिति अपनी जांच के आधार पर तथ्यों और परिस्थितियों को सामने रख सकती है तथा आवश्यक सिफारिशें कर सकती है।
समिति को जानकारी सार्वजनिक करने और शिकायतें लेने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने HPEC को अपनी कार्यवाही के लिए व्यापक स्तर पर जानकारी सार्वजनिक करने की अनुमति दी है। समिति आम लोगों से सुझाव और आपत्तियां भी मांग सकती है। इसके अलावा जरूरतमंद और संवेदनशील गवाहों तक पहुंच बनाने के लिए समिति अलग व्यवस्था तैयार कर सकती है।
ऐसे लोगों के लिए हेल्पलाइन जैसी व्यवस्था भी बनाई जा सकती है, जो किसी कारण से सीधे समिति के सामने उपस्थित होकर अपनी बात नहीं रख सकते। समिति दस्तावेजी साक्ष्यों के अलावा लोगों की ओर से दिए गए प्रतिवेदन और गुमनाम शिकायतों पर भी विचार कर सकती है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से अदालत में पेश होते हुए बताया कि समिति की पहली बैठक 15 सितंबर को निर्धारित की गई है। इसके बाद समिति अपनी जांच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगी।
1 सितंबर के आदेश का भी दिया गया हवाला
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1 सितंबर के आदेश का भी उल्लेख किया। अदालत ने उस समय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शनों से जुड़े आपराधिक मामलों को खत्म करने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 20 से 25 जुलाई के बीच हुए प्रदर्शनों के संबंध में दर्ज FIR पर आगे कोई कार्रवाई या जांच नहीं की जाएगी और उन्हें बंद माना जाएगा। अदालत ने इन घटनाओं के संबंध में नई FIR दर्ज नहीं करने का भी निर्देश दिया था।
इसी पृष्ठभूमि में HPEC की शक्तियों को लेकर स्थिति स्पष्ट करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने एक ओर समिति को आरोपों और घटनाओं की स्वतंत्र जांच का अधिकार दिया है, वहीं दूसरी ओर FIR दर्ज कराने के मामले में उसकी सीमा भी निर्धारित कर दी है।
पुलिस कार्रवाई और हिंसा के आरोपों की जांच करेगी HPEC
HPEC का गठन पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में किया गया है। समिति को 20 जुलाई के छात्र प्रदर्शन से जुड़े अलग-अलग आरोपों की स्वतंत्र जांच करनी है।
समिति विशेष रूप से पुलिस की ओर से अत्यधिक बल प्रयोग किए जाने के आरोपों की जांच करेगी। इसके साथ ही सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप भी जांच के दायरे में हैं।
जांच के दौरान समिति दस्तावेजी साक्ष्य, लोगों की ओर से प्रस्तुत किए गए प्रतिवेदन और गुमनाम शिकायतें प्राप्त कर सकती है। गवाहों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए गुमनाम शिकायतों को भी स्वीकार करने की व्यवस्था रखी गई है।
समिति के गठन में बदलाव की मांग खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने HPEC की संरचना बदलने की मांग को भी स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि समिति का गठन स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने किया है और उसके काम शुरू करने से पहले इसे दोबारा गठित नहीं किया जाएगा।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समिति के कामकाज या उसकी प्रक्रिया को लेकर किसी भी पक्ष को कोई चिंता है तो वह अपनी आपत्ति या समस्या सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रख सकता है। इस तरह समिति को काम करने की स्वतंत्रता के साथ-साथ शीर्ष अदालत की निगरानी में रखने की व्यवस्था कायम रहेगी।
14 वर्षीय लड़की को कथित धमकी के मामले में तत्काल कार्रवाई
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन से जुड़े 14 वर्षीय लड़की को कथित तौर पर धमकी देने और परेशान किए जाने के मामले को गंभीरता से लिया। अदालत ने दिल्ली पुलिस को संसद मार्ग थाने में दर्ज FIR पर तत्काल कार्रवाई करने और रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
बताया गया कि लड़की फिलहाल उत्तर प्रदेश में रह रही है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को लड़की और उसके परिवार को पुलिस सुरक्षा तथा आवश्यक सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी बच्चे या उसके परिवार को आपराधिक कार्यवाही आगे नहीं बढ़ाने के लिए डराने या धमकाने की कोशिश की जा रही है, तो ऐसे मामले में HPEC की जांच के नतीजे का इंतजार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि 14 वर्षीय लड़की के बयान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो मामले की जांच की जानी चाहिए और उसे उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना चाहिए। इससे अदालत ने नाबालिग से जुड़े कथित धमकी के मामले में तत्काल पुलिस कार्रवाई की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया।
आगे क्या होगा
HPEC की पहली बैठक 15 सितंबर को निर्धारित है। समिति प्रदर्शन से जुड़े आरोपों, पुलिस कार्रवाई, सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे मामलों की जांच करेगी। समिति लोगों से सुझाव, आपत्तियां, प्रतिवेदन और शिकायतें भी प्राप्त कर सकती है तथा अपनी जांच के आधार पर सुप्रीम कोर्ट को सिफारिशें देगी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया में समिति की भूमिका और उसकी सीमा दोनों स्पष्ट कर दी हैं। समिति तथ्यों की जांच और सिफारिशों तक सीमित रहेगी, जबकि प्रदर्शन से जुड़े मामलों में FIR दर्ज कराने का अधिकार शीर्ष अदालत के पास रहेगा। वहीं, 14 वर्षीय लड़की से जुड़े कथित धमकी के मामले में अदालत ने HPEC की रिपोर्ट का इंतजार किए बिना तत्काल पुलिस कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
