नई दिल्ली/इस्लामाबाद। सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच गया है। पाकिस्तान ने सिंधु नदी के पानी से जुड़े मुद्दे को लेकर हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय का रुख किया, लेकिन वहां से आए फैसले के बावजूद भारत अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस न्यायिक प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करता और संबंधित अदालत के फैसले को भारत पर बाध्यकारी नहीं मानता।
पहलगाम हमले के बाद भारत ने लिया था बड़ा फैसला
भारत ने पिछले वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित करने का निर्णय लिया था। इस फैसले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच पहले से तनावपूर्ण संबंधों में पानी का मुद्दा भी बेहद महत्वपूर्ण हो गया।
भारत के इस कदम को लेकर उस समय अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। हालांकि, समय बीतने के साथ पाकिस्तान की ओर से सिंधु जल संधि को लेकर लगातार दबाव बनाने की कोशिशें जारी रहीं।
पाकिस्तान ने इस मुद्दे पर अपनी आपत्तियां अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने की कोशिश की। इसके अलावा भारत के खिलाफ कड़ा बयानबाजी का दौर भी चलता रहा।
पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय अदालत का क्यों किया रुख?
सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद को लेकर पाकिस्तान हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय यानी Permanent Court of Arbitration तक पहुंचा। पाकिस्तान की कोशिश थी कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से भारत पर संधि के प्रावधानों के पालन का दबाव बनाया जा सके।
पिछले महीने इस मामले में अदालत की ओर से फैसला भी आया। हालांकि भारत ने इस फैसले को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। भारत का कहना है कि उसने इस अदालत के अधिकार क्षेत्र को कभी स्वीकार नहीं किया और न ही वह इस मामले की कार्यवाही में शामिल हुआ।
भारत ने फैसले को क्यों बताया कानूनी रूप से अमान्य?
भारत का रुख बेहद स्पष्ट है। उसका कहना है कि संबंधित अदालत को सिंधु जल संधि के तहत भारत के संप्रभु फैसलों पर निर्णय देने का अधिकार नहीं है। भारत ने अदालत की कार्यवाही में हिस्सा ही नहीं लिया, इसलिए उसके फैसले को भारत अपने लिए बाध्यकारी नहीं मानता।
भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसने इस न्यायिक प्रक्रिया को अपनी सहमति नहीं दी थी। ऐसे में अदालत के फैसले को स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता।
यही वजह है कि हेग से आए फैसले के बाद भी सिंधु जल को लेकर भारत की नीति में कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया है।
विवाद सुलझाने की प्रक्रिया को लेकर भी भारत की अलग दलील
सिंधु जल संधि के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवादों को सुलझाने के लिए अलग-अलग प्रक्रियाओं का प्रावधान है। भारत का मानना है कि इन प्रक्रियाओं को निर्धारित क्रम में अपनाया जाना चाहिए।
संधि के तहत कुछ विवादों के समाधान के लिए न्यूट्रल एक्सपर्ट्स की व्यवस्था है। भारत का तर्क है कि जब संधि में विवाद समाधान के अलग-अलग चरण निर्धारित हैं तो उन्हें एक साथ इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
इसी मुद्दे को लेकर भारत ने मध्यस्थता अदालत की कार्यवाही से दूरी बनाए रखी।
पाकिस्तान के लिए क्यों अहम है सिंधु जल का मुद्दा?
सिंधु जल भारत और पाकिस्तान के संबंधों में लंबे समय से संवेदनशील विषय रहा है। दोनों देशों के बीच जल बंटवारे को लेकर वर्ष 1960 में सिंधु जल संधि हुई थी। मौजूदा परिस्थितियों में इस संधि को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं।
पाकिस्तान लगातार यह प्रयास करता रहा है कि सिंधु जल से जुड़े विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाए और भारत पर दबाव बनाया जाए। इसी रणनीति के तहत उसने हेग की मध्यस्थता अदालत का भी सहारा लिया।
अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलने की उम्मीद में पाकिस्तान
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान को लगता है कि हाल के वर्षों में उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति में सुधार हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिशों, सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते और सऊदी अरब, पाकिस्तान तथा तुर्की के बीच त्रिपक्षीय रक्षा समझौते के बाद पाकिस्तान को उम्मीद है कि संवेदनशील मुद्दों पर उसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल सकता है।
पाकिस्तान को यह भी उम्मीद रही कि पानी के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाकर भारत पर दबाव बनाया जा सकेगा। हालांकि, भारत ने इस रणनीति के बावजूद अपने रुख में बदलाव नहीं किया है।
पूर्व विदेश सचिव ने पाकिस्तान की रणनीति पर क्या कहा?
भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने एनडीटीवी में लिखे एक लेख में पाकिस्तान की रणनीति का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, पाकिस्तान अपने प्रचार अभियान को आगे बढ़ाने के लिए मध्यस्थता अदालत के फैसले का इस्तेमाल कर सकता है।
उनका मानना है कि पाकिस्तान इस फैसले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए प्रस्तुत करने की कोशिश करेगा। हालांकि भारत इस तरह के दावों को स्वीकार नहीं करेगा।
क्या सिंधु जल संधि को अंतरराष्ट्रीय समझौता माना जाए?
इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण सवाल सिंधु जल संधि की प्रकृति को लेकर भी है। कंवल सिब्बल के लेख के मुताबिक, पाकिस्तान यह दावा करता रहा है कि सिंधु जल संधि एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, ताकि उसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल सके।
वहीं भारत की ओर से इस पर अलग रुख रखा जाता है। लेख में कहा गया है कि सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ एक द्विपक्षीय समझौता है, जिसे दोनों देशों की सरकारों की मंजूरी के बाद लागू किया गया था।
लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि सिंधु जल संधि को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मंजूरी नहीं मिली है।
संधि के प्रावधानों पर भी उठते हैं सवाल
सिंधु जल संधि के उस हिस्से को लेकर भी चर्चा होती रही है, जो मध्यस्थता अदालत के गठन से संबंधित है। संधि के एनेक्शर G में इससे जुड़ी व्यवस्था का उल्लेख है।
उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस व्यवस्था में अदालत के तकनीकी सदस्य के चयन की प्रक्रिया में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के अध्यक्ष और लंदन स्थित इंपीरियल कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के रेक्टर की भूमिका बताई गई है।
वहीं अदालत के कानूनी सदस्य के चयन से जुड़ी व्यवस्था में अमेरिका के मुख्य न्यायाधीश और इंग्लैंड के लॉर्ड चीफ जस्टिस का उल्लेख किया गया है।
पाकिस्तान की कोशिश जारी, लेकिन भारत अपने रुख पर कायम
सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों का सहारा ले रहा है, लेकिन भारत ने हेग की कार्यवाही और उसके फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। भारत का कहना है कि संबंधित अदालत के पास उसके संप्रभु निर्णयों पर अधिकार क्षेत्र नहीं है।
इस पूरे विवाद से साफ है कि सिंधु जल आने वाले समय में भी भारत-पाकिस्तान संबंधों का एक बेहद संवेदनशील मुद्दा बना रह सकता है। फिलहाल पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि भारत अपने अधिकार क्षेत्र और संधि से जुड़े अपने रुख पर कायम है।
