पराठा भारतीय घरों में नाश्ते का सबसे पसंदीदा ऑप्शन माना जाता है। खासकर आलू पराठा, पनीर पराठा या सादा पराठा कई लोगों की सुबह की पहली पसंद होता है। गरमा-गरम पराठे के साथ दही या मक्खन का स्वाद लोगों को खूब पसंद आता है। हालांकि अगर पराठा रोजाना और ज्यादा मात्रा में खाया जाए तो यह सेहत पर नकारात्मक असर भी डाल सकता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि पराठा अपने आप में खराब खाना नहीं है, लेकिन इसे किस तरह बनाया जाता है, किसके साथ खाया जाता है और आपकी लाइफस्टाइल कैसी है, यह तय करता है कि इसका शरीर पर क्या असर होगा।

Source : Pexel
बढ़ सकता है वजन और मोटापे का खतरा
एक्सपर्ट्स के अनुसार पराठे में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज्यादा होती है, जिससे शरीर को तुरंत ऊर्जा मिलती है। लेकिन अगर फिजिकल एक्टिविटी कम हो और रोजाना तेल, घी या मक्खन से बने पराठे खाए जाएं तो एक्स्ट्रा कैलोरी शरीर में फैट के रूप में जमा होने लगती है। लंबे समय तक ऐसा होने पर वजन बढ़ने और मोटापे का खतरा बढ़ सकता है।
ब्लड शुगर पर पड़ सकता है असर
ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाले पराठे खाने के बाद ब्लड शुगर का स्तर तेजी से बढ़ सकता है। खासतौर पर उन लोगों के लिए यह परेशानी बढ़ा सकता है, जिनकी लाइफस्टाइल काफी हद तक बैठकर काम करने वाली है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि शरीर जब इस ऊर्जा का उपयोग नहीं कर पाता, तो यह धीरे-धीरे इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ा सकता है।
दिल की सेहत के लिए बन सकता है जोखिम
अगर पराठे को ज्यादा घी, मक्खन या तेल के साथ नियमित रूप से खाया जाए तो यह शरीर में सैचुरेटेड फैट की मात्रा बढ़ा सकता है। इससे कोलेस्ट्रॉल बढ़ने और दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। खासतौर पर हाई कोलेस्ट्रॉल या पहले से हार्ट रोग से जूझ रहे लोगों को पराठे का सेवन सीमित मात्रा में करने की सलाह दी जाती है।
पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं
कुछ लोगों को रोजाना पराठा खाने से एसिडिटी, अपच और पेट फूलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। भारी और तेल से बने हुए पराठे पचने में ज्यादा समय लेते हैं। अगर इसके साथ पर्याप्त फाइबर और प्रोटीन न लिया जाए तो पाचन तंत्र पर दबाव पड़ सकता है।
डाइट में कम हो सकती है पोषण की विविधता
एक्सपर्ट्स का मानना है कि रोजाना एक ही तरह का नाश्ता करने से डाइट में विविधता कम हो जाती है। अगर हर दिन सिर्फ पराठा खाया जाए तो शरीर को दूसरे जरूरी पोषक तत्व, विटामिन और मिनरल पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते हैं। लंबे समय में यह पोषण असंतुलन का कारण बन सकता है।
