erere | Source: rererआज की बदलती जीवनशैली के कारण मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। अधिकांश लोग इन बीमारियों को अलग-अलग मानते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार ये सभी एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसी संबंध को समझाने के लिए अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन ने Cardiovascular Kidney Metabolic (CKM) Syndrome की अवधारणा पेश की है। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों की समय रहते पहचान करना है, जिनमें भविष्य में हृदय रोग, किडनी की बीमारी और मेटाबॉलिक विकारों का खतरा अधिक हो सकता है।

क्या है Cardiovascular Kidney Metabolic (CKM) Syndrome?

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार CKM Syndrome कोई एक अलग बीमारी नहीं है, बल्कि यह ऐसी स्थिति है जिसमें हृदय, किडनी और शरीर की मेटाबॉलिक प्रणाली एक-दूसरे को प्रभावित करती है। इसमें मोटापा, डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई ब्लड प्रेशर और असामान्य कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं आपस में जुड़ी रहती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन अंगों या प्रणालियों में से किसी एक की कार्यक्षमता प्रभावित होती है तो इसका असर धीरे-धीरे अन्य अंगों पर भी पड़ने लगता है। यही कारण है कि इस सिंड्रोम को गंभीर स्वास्थ्य जोखिम माना जाता है।

कैसे एक समस्या दूसरी बीमारी को जन्म देती है

CKM Syndrome में कई स्वास्थ्य समस्याएं एक चक्र की तरह काम करती हैं।

मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ा सकता है।

इंसुलिन रेजिस्टेंस से डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।

डायबिटीज किडनी की छोटी रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है।

किडनी की बीमारी हाई ब्लड प्रेशर को बढ़ा सकती है।

हाई ब्लड प्रेशर और किडनी की समस्या मिलकर हृदय पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार यह एक ऐसा चक्र है जिसमें एक बीमारी दूसरी बीमारी को और अधिक गंभीर बना सकती है।

सांस फूलना और सीने में दर्द क्यों हो सकते हैं चेतावनी के संकेत

क्लीवलैंड क्लीनिक के अनुसार CKM Syndrome की शुरुआती अवस्था में कई लोगों को कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। लेकिन जैसे-जैसे हृदय और किडनी प्रभावित होने लगते हैं, शरीर कुछ महत्वपूर्ण संकेत देना शुरू कर देता है।

इन संकेतों में थोड़ी मेहनत करने पर सांस फूलना, सीने में दर्द या दबाव महसूस होना, जल्दी थक जाना, पैरों या टखनों में सूजन, रात में सांस लेने में परेशानी, शरीर में तरल पदार्थ जमा होने के कारण तेजी से वजन बढ़ना तथा धड़कन का तेज या अनियमित होना शामिल हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ये लक्षण हार्ट फेल्योर, कोरोनरी आर्टरी डिजीज या किडनी की बीमारी से भी जुड़े हो सकते हैं। इसलिए इन्हें सामान्य थकान या कमजोरी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

डायबिटीज, मोटापा और हाई ब्लड प्रेशर से क्या है संबंध

नेशनल किडनी फाउंडेशन के अनुसार CKM Syndrome की सबसे बड़ी वजह मेटाबॉलिक जोखिम कारक हैं।

विशेष रूप से पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी शरीर में सूजन बढ़ाने के साथ इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है।

लगातार बढ़ा हुआ ब्लड शुगर किडनी की छोटी रक्त वाहिकाओं और हृदय दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है।

उच्च रक्तचाप हृदय को अधिक मेहनत करने के लिए मजबूर करता है और समय के साथ किडनी की कार्यक्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

वहीं, एलडीएल कोलेस्ट्रॉल बढ़ने पर धमनियों में प्लाक बनने लगता है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ जाता है।

क्या शुरुआती चरण में बचाव संभव है?

विशेषज्ञों और अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन का मानना है कि यदि जोखिम कारकों की समय रहते पहचान कर उन्हें नियंत्रित किया जाए तो CKM Syndrome से होने वाली गंभीर जटिलताओं का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।

इसके लिए शरीर का वजन नियंत्रित रखना, सप्ताह में कम से कम 150 मिनट नियमित व्यायाम करना, नमक और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सीमित सेवन करना, भोजन में फल, सब्जियां, साबुत अनाज और दालों को शामिल करना लाभकारी माना गया है।

इसके अलावा धूम्रपान और तंबाकू से दूरी बनाए रखना, शराब का सीमित सेवन करना, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच कराना तथा चिकित्सक द्वारा निर्धारित दवाओं का नियमित सेवन करना भी आवश्यक है।

समय पर जांच और सही जीवनशैली है सबसे बड़ा बचाव

विशेषज्ञों के अनुसार CKM Syndrome यह समझने का एक महत्वपूर्ण तरीका है कि हृदय, किडनी और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि किसी व्यक्ति को डायबिटीज, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर या किडनी रोग जैसी समस्याएं पहले से हैं और साथ ही सांस फूलना, सीने में दर्द या जल्दी थकने जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।