ere | Source: ereनई दिल्ली। शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत की मुश्किलें बढ़ने की खबरों के बीच सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की टिप्पणियों को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। खबरों के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश को लेकर की गई टिप्पणियों के संदर्भ में अदालत ने राउत के आचरण पर सवाल उठाया है। यह घटनाक्रम राहुल गांधी समेत 12 नेताओं की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं। गुरुवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जवाब मांगा। इसी दौरान पीठ ने 12 अक्टूबर को नेताओं की ओर से निकाले गए मार्च और अदालत पर दबाव बनाने की कथित कोशिश का भी उल्लेख किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को किसी भी तरह के दबाव में नहीं लाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- न्यायपालिका को दबाव में नहीं ला सकता कोई

सुनवाई के दौरान पीठ ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सख्त रुख दिखाया। अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति न्यायपालिका को डराकर या धमकाकर दबाव में नहीं ला सकता। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि अदालत के बाहर दिए जा रहे बयानों और अदालत के भीतर रखे जा रहे पक्षों, दोनों पर उसकी नजर है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने किसी व्यक्ति का नाम लिए बिना कहा कि अगली सुनवाई की तारीख पर याचिकाकर्ताओं में से एक से उसके आचरण के बारे में सवाल किया जाएगा। उन्होंने कहा, “हम कोई अलग-थलग दुनिया में नहीं बैठे हैं। हमें पता है कि वे बाहर क्या बयान दे रहे हैं और अदालत में क्या कह रहे हैं। हमें सबकुछ पता है।” इस टिप्पणी को अदालत की उस चिंता से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसमें न्यायिक प्रक्रिया के दौरान दबाव बनाने की किसी भी कोशिश को लेकर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, सुनवाई में किसी याचिकाकर्ता के आचरण पर सवाल उठाने की बात और किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना दो अलग-अलग बातें हैं।

राहुल गांधी समेत 12 नेताओं की याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब तलब

यह पूरा मामला राहुल गांधी समेत 12 नेताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, याचिका में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान पीठ ने 12 अक्टूबर को निकाले गए मार्च का भी संज्ञान लिया। अदालत के सामने यह सवाल आया कि क्या इस मार्च के जरिए न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश की गई थी। इसी संदर्भ में पीठ ने कहा कि वह अगली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं में से एक के आचरण पर सवाल करेगी। इस घटनाक्रम ने मामले को केवल चुनाव आयोग से जुड़े विवाद तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अदालत के प्रति सार्वजनिक आचरण से जुड़े सवाल भी सामने ला दिए हैं।

‘नोटिस जारी करने का मतलब यह नहीं कि हम कुछ गलत ठहरा रहे हैं’

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करने और किसी व्यक्ति के आचरण पर सवाल उठाने के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि नोटिस जारी किए जाने का यह अर्थ नहीं है कि अदालत ने संबंधित व्यक्ति को गलत ठहरा दिया है। अदालत ने कहा, “नोटिस जारी किया जाए। पर इससे पहले एक एतराज है। हम अगली सुनवाई के दिन एक याचिकाकर्ता से उसके व्यवहार पर सवाल करना चाहेंगे। नोटिस देने का यह मतलब नहीं है कि हम कुछ गलत ठहरा रहे हैं। हम नोटिस जारी कर रहे हैं। लेकिन एक याचिकाकर्ता को लेकर हम इस मामले को जरूर सुनेंगे।” पीठ ने आगे कहा कि संबंधित याचिकाकर्ता को अपने आचरण की वजह बताने का अवसर दिया जाएगा। अदालत की टिप्पणी से स्पष्ट है कि इस स्तर पर संबंधित व्यक्ति के पक्ष को सुने जाने की बात कही गई है। इसलिए इसे अंतिम न्यायिक निष्कर्ष या दोष सिद्ध होने के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

संजय राउत के आचरण पर सवाल, लेकिन अंतिम निष्कर्ष का इंतजार

इस घटनाक्रम के बीच शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत का नाम चर्चा में आया है। खबरों में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को लेकर उनकी टिप्पणियों के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी और उनके आचरण पर जवाब मांगे जाने की बात कही गई है। हालांकि, उपलब्ध विवरण में अदालत के उस आदेश का पूरा पाठ शामिल नहीं है, जिससे यह निश्चित रूप से स्पष्ट हो सके कि संबंधित याचिकाकर्ता के रूप में संजय राउत को ही औपचारिक रूप से जवाब देने के लिए कहा गया है या नहीं। इसलिए इस मामले में अदालत की सटीक कार्रवाई और संबंधित व्यक्ति की स्थिति को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले आधिकारिक आदेश की पुष्टि आवश्यक है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अदालत का स्पष्ट संदेश

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का प्रमुख पहलू न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया पर किसी भी प्रकार के दबाव को लेकर उसकी चिंता है। अदालत ने संकेत दिया कि सार्वजनिक बयानबाजी और अदालत के बाहर होने वाली गतिविधियों को न्यायिक कार्यवाही से अलग करके नहीं देखा जा सकता, खासकर तब जब यह आरोप लगाया जाए कि किसी मामले में दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि नोटिस जारी करना अपने आप में दोष निर्धारित करना नहीं है। संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। ऐसे में आगे की सुनवाई में अदालत के सामने रखे जाने वाले तथ्यों और संबंधित याचिकाकर्ता के जवाब से ही स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।