गले में बार-बार दर्द, सूजन, बुखार या खाना निगलने में परेशानी हो तो अक्सर लोगों को लगता है कि टॉन्सिल ही इसकी वजह हैं और अब इन्हें निकलवाना ही पड़ेगा। लेकिन ऐसा हर मामले में नहीं होता। टॉन्सिलाइटिस यानी टॉन्सिल में संक्रमण कई बार दवाओं, आराम और उचित देखभाल से ठीक हो जाता है। टॉन्सिल निकालने की सर्जरी यानी टॉन्सिलेक्टॉमी पर आमतौर पर तभी विचार किया जाता है, जब संक्रमण बार-बार और गंभीर रूप से हो या टॉन्सिल के बढ़े आकार से सांस लेने जैसी समस्या पैदा होने लगे।
टॉन्सिल शरीर में आखिर करते क्या हैं?
टॉन्सिल गले के पीछे मौजूद लिम्फेटिक टिशू के दो छोटे हिस्से होते हैं। ये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं और मुंह या नाक के रास्ते शरीर में प्रवेश करने वाले कुछ कीटाणुओं को पहचानने में भूमिका निभाते हैं। बच्चों में टॉन्सिल प्रतिरक्षा प्रक्रिया में अधिक सक्रिय हो सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ इनके आकार और भूमिका में बदलाव आ सकता है। इसलिए केवल टॉन्सिल का बड़ा होना अपने आप में ऑपरेशन कराने की पर्याप्त वजह नहीं माना जाता।
जब टॉन्सिल में संक्रमण या सूजन होती है, तो इसे टॉन्सिलाइटिस कहा जाता है। इसमें गले में दर्द, निगलने में परेशानी, बुखार, टॉन्सिल पर सफेद या पीले धब्बे और गर्दन की लिम्फ नोड्स में सूजन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
हर बार गले का संक्रमण सर्जरी का संकेत नहीं
टॉन्सिलेक्टॉमी एक सर्जिकल प्रक्रिया है और किसी भी ऑपरेशन की तरह इसमें भी कुछ जोखिम हो सकते हैं। इसलिए यदि टॉन्सिल का संक्रमण कभी-कभार होता है और इलाज से ठीक हो जाता है, तो आमतौर पर टॉन्सिल निकालने की जरूरत नहीं पड़ती।
खासकर बच्चों में डॉक्टर कई बार स्थिति पर निगरानी रखने की सलाह देते हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कुछ बच्चों में उम्र बढ़ने के साथ बार-बार होने वाले गले के संक्रमण की समस्या कम हो सकती है। डॉक्टर केवल यह नहीं देखते कि संक्रमण कितनी बार हुआ, बल्कि यह भी देखते हैं कि संक्रमण कितना गंभीर था और उसका असर बच्चे की पढ़ाई या व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी पर कितना पड़ा।
कब डॉक्टर टॉन्सिल निकालने की सलाह दे सकते हैं?
जब टॉन्सिलाइटिस बार-बार हो, संक्रमण गंभीर हो और इसके कारण सामान्य जीवन प्रभावित होने लगे, तब ईएनटी विशेषज्ञ टॉन्सिलेक्टॉमी पर विचार कर सकते हैं। बार-बार होने वाले गंभीर संक्रमण के अलावा टॉन्सिल के अत्यधिक बढ़ जाने से सोते समय सांस लेने में परेशानी जैसी स्थिति भी सर्जरी का कारण बन सकती है।
बच्चों में बार-बार होने वाले टॉन्सिल संक्रमण के लिए डॉक्टर आमतौर पर कुछ निश्चित मानकों को ध्यान में रखते हैं। इनमें पिछले एक साल में सात या उससे अधिक बार संक्रमण होना, लगातार दो वर्षों में हर साल पांच या उससे अधिक बार संक्रमण होना या लगातार तीन वर्षों में हर साल तीन या उससे अधिक बार संक्रमण होना शामिल हो सकता है।
सिर्फ गिनती नहीं, संक्रमण की गंभीरता भी मायने रखती है
बार-बार टॉन्सिलाइटिस होने की संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन यही अकेला आधार नहीं है। डॉक्टर संक्रमण की गंभीरता, लक्षणों की प्रकृति, मेडिकल रिकॉर्ड और उपचार से मिली राहत को भी देखते हैं। कुछ मामलों में बुखार, गर्दन की लिम्फ नोड्स में सूजन या ग्रुप ए स्ट्रेप्टोकोकल संक्रमण की पुष्टि जैसी स्थितियां भी निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इसलिए किसी व्यक्ति को केवल गले में बार-बार दर्द होने के आधार पर खुद से यह तय नहीं करना चाहिए कि अब टॉन्सिल का ऑपरेशन जरूरी है।
टॉन्सिल बड़े हैं तो भी हमेशा ऑपरेशन जरूरी नहीं
टॉन्सिल का आकार बढ़ा हुआ होना अपने आप में सर्जरी का सीधा कारण नहीं है। यदि बड़े टॉन्सिल के बावजूद सांस लेने, सोने, निगलने या रोजमर्रा की गतिविधियों में कोई गंभीर परेशानी नहीं है, तो डॉक्टर स्थिति के अनुसार निगरानी और उपचार की सलाह दे सकते हैं।
वहीं यदि बढ़े हुए टॉन्सिल के कारण सोते समय सांस लेने में रुकावट, लगातार परेशानी या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो विशेषज्ञ सर्जरी की जरूरत का मूल्यांकन कर सकते हैं।
बार-बार दर्द हो तो खुद से दवा लेने के बजाय डॉक्टर से मिलें
टॉन्सिलाइटिस के लक्षण अलग-अलग कारणों से हो सकते हैं और हर बार एक जैसा इलाज जरूरी नहीं होता। इसलिए बार-बार गले में दर्द, बुखार, निगलने में परेशानी या टॉन्सिल पर सफेद-पीले धब्बे दिखाई देने पर खुद से दवा शुरू करने के बजाय ईएनटी विशेषज्ञ से जांच कराना बेहतर है। डॉक्टर संक्रमण की गंभीरता और बार-बार होने की स्थिति को देखते हुए तय करते हैं कि दवाओं से इलाज पर्याप्त है या टॉन्सिलेक्टॉमी की जरूरत पड़ सकती है।
यह सामान्य स्वास्थ्य जानकारी है। सर्जरी का निर्णय व्यक्ति की जांच, मेडिकल हिस्ट्री और डॉक्टर की सलाह के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।
