पाली। रक्षाबंधन का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में राखियों की रौनक बढ़ गई है। इस बार राजस्थान के पाली जिले में एक अनोखा प्रयोग लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। यहां पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए गोबर से राखियां और ज्वैलरी तैयार की जा रही हैं। खास बात यह है कि इन उत्पादों को इस तरह सजाया गया है कि पहली नजर में इन्हें देखकर यह अंदाजा लगाना आसान नहीं होता कि ये गोबर से बनाए गए हैं।
महंगे सोने-चांदी के बीच गोबर से बनी राखी का अनोखा विकल्प
इस साल रक्षाबंधन का त्योहार 28 अगस्त को मनाया जाएगा। त्योहार से पहले सोने और चांदी की कीमतों में बढ़ोतरी का असर बाजार में दिखाई दे रहा है। ऐसे समय में पारंपरिक राखियों और आभूषणों के अलावा पर्यावरण के अनुकूल विकल्प भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।
कुछ वर्षों से बाजार में गोबर से बनी राखियां देखने को मिल रही थीं, लेकिन इस बार पाली में गोबर से बनी ज्वैलरी भी तैयार की गई है। इसमें अलग-अलग डिजाइन के आभूषण शामिल हैं। यह पहल पारंपरिक त्योहार को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की कोशिश के रूप में सामने आई है।
पाली में तैयार हो रही गोबर की राखियां और ज्वैलरी
राजस्थान के पाली जिले में एक व्यक्ति ने गोबर का इस्तेमाल करके राखी, नेकलेस और ईयर रिंग्स समेत कई तरह के डिजाइन तैयार किए हैं। गोबर से बनाए गए इन उत्पादों को आकर्षक और ईको-फ्रेंडली रंगों से सजाया गया है। इसके बाद उनमें धागा पिरोकर उन्हें राखी का रूप दिया जाता है।
इन उत्पादों को अलग-अलग डिजाइन में तैयार किया जा रहा है, जिससे ग्राहकों को अपनी पसंद के अनुसार विकल्प मिल सकें। खास बात यह भी है कि ग्राहक अपनी साड़ी या ड्रेस के डिजाइन को ध्यान में रखकर ज्वैलरी तैयार करवा सकते हैं।
राखी उतारने के बाद मिट्टी में डालिए, उग सकता है पौधा
इस पहल की सबसे खास बात गोबर से बनी बीज वाली राखी है। राखी तैयार करते समय उसमें कुछ खास किस्म के बीज भी डाले जाते हैं। इसका उद्देश्य राखी के इस्तेमाल के बाद उसे मिट्टी में डालकर पौधा उगाने का विकल्प देना है।
राखी उतारने के बाद यदि इसे मिट्टी में लगाया जाता है तो इसमें मौजूद बीज से फूल देने वाला पौधा उग सकता है। इस तरह राखी केवल भाई-बहन के रिश्ते की यादगार वस्तु नहीं रहती, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है।
गोबर से बने नेकलेस और ईयर रिंग्स ने भी खींचा ध्यान
गोबर से तैयार किए जा रहे उत्पादों में केवल राखियां ही शामिल नहीं हैं। इस पहल के तहत नेकलेस, कानों के ईयर रिंग्स और नाक में पहनने वाले आभूषण भी तैयार किए जा रहे हैं। इनके डिजाइन और सजावट पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
आकर्षक रंगों और डिजाइन के कारण ये आभूषण देखने में अलग नजर आते हैं। इन्हें देखकर पहली नजर में यह अनुमान लगाना मुश्किल हो सकता है कि इनका निर्माण गोबर से किया गया है। महंगे सोने-चांदी के आभूषणों के विकल्प के तौर पर यह प्रयोग बाजार में एक अलग तरह की पहल के रूप में दिखाई दे रहा है।
कपड़ों के हिसाब से भी बन सकती है ज्वैलरी
इस अनोखे उत्पाद को तैयार करने वाले व्यक्ति के अनुसार ग्राहक अपनी पसंद की साड़ी या ड्रेस के डिजाइन के अनुरूप भी ज्वैलरी बनवा सकते हैं। यानी पारंपरिक आभूषणों की तरह इन उत्पादों में भी पसंद और पहनावे के अनुसार डिजाइन का विकल्प उपलब्ध है।
त्योहारों के मौसम में इस तरह के उत्पाद उन लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल वस्तुओं को प्राथमिकता देते हैं और पारंपरिक चीजों से कुछ अलग इस्तेमाल करना चाहते हैं।
पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी है यह पहल
गोबर से बने उत्पादों की खासियत इन्हें पर्यावरण के अनुकूल बनाने की कोशिश है। इस्तेमाल के बाद बीज वाली राखी को मिट्टी में डालने से पौधा उगाने का विकल्प मिलता है। इस तरह राखी के उपयोग के बाद भी उसका एक अलग उद्देश्य पूरा हो सकता है।
ऐसे बायोडिग्रेडेबल उत्पाद त्योहारों के दौरान प्लास्टिक और अन्य गैर-जैविक सामग्री के इस्तेमाल को कम करने की दिशा में एक विकल्प हो सकते हैं। खासकर बीज वाली राखी त्योहार और पर्यावरण के बीच एक अलग तरह का संबंध स्थापित करती है।
रक्षाबंधन के बाजार में दिख रहा नया प्रयोग
रक्षाबंधन केवल राखी बांधने का त्योहार नहीं है, बल्कि बाजार में इससे जुड़े कई तरह के उत्पादों की मांग भी बढ़ जाती है। इस बार पाली में गोबर से बनी राखी के साथ ज्वैलरी का प्रयोग इस बाजार को एक अलग पहचान दे रहा है।
जहां महंगे सोने-चांदी के आभूषण हर व्यक्ति की पहुंच में नहीं होते, वहीं गोबर से तैयार किए गए इन उत्पादों को एक वैकल्पिक और पर्यावरण-अनुकूल प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि इनकी वास्तविक बिक्री और मांग के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन बाजार में इनका दिखाई देना इस अनोखे प्रयोग की ओर लोगों का ध्यान जरूर खींच रहा है।
भाई-बहन के रिश्ते के साथ पर्यावरण का संदेश
बीज वाली राखी इस पहल को और खास बनाती है। सामान्य राखी का उपयोग त्योहार के बाद समाप्त हो जाता है, जबकि बीज वाली राखी को मिट्टी में डालने पर उससे पौधा उगाने की संभावना रखी गई है। इस तरह राखी के माध्यम से भाई-बहन के रिश्ते की भावना के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी जोड़ा गया है।
निष्कर्ष
पाली में गोबर से राखी और ज्वैलरी बनाने का यह प्रयोग रक्षाबंधन के बाजार में एक अलग तस्वीर पेश कर रहा है। गोबर से तैयार राखी, नेकलेस और ईयर रिंग्स को आकर्षक रंगों और डिजाइनों से सजाया जा रहा है। सबसे खास बीज वाली राखी है, जिसे इस्तेमाल के बाद मिट्टी में डालने पर फूल देने वाला पौधा उग सकता है। इस तरह यह पहल रक्षाबंधन की परंपरा को पर्यावरण संरक्षण के विचार से जोड़ने का अनोखा प्रयास सामने रखती है।
