वाशिंगटन / नई दिल्ली। अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनाव (Mid-term Elections) के नतीजों ने पूरे विश्व की राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक बहुत बड़ा भूचाल ला दिया है। महंगाई और टैरिफ की मार झेल रही अमेरिकी जनता ने अपने वोट की ताकत से वाशिंगटन की पूरी बिसात ही पलट दी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और सीनेट दोनों में ही करारी हार का सामना करना पड़ा है। इस हार के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या टैरिफ और व्यापार युद्ध (Trade War) की धमकियां देने वाले ट्रंप के पंख अब कट चुके हैं और क्या भारत को वैश्विक व्यापार वार्ता में एक बड़ा तुरुप का पत्ता मिल गया है?
अमेरिकी जनता का जोरदार तमाचा: क्यों हारा ट्रंप का किला?
अमेरिका में आम जनता पिछले काफी समय से आसमान छूती महंगाई और हर सामान पर लगने वाले भारी-भरकम इंपोर्ट ड्यूटी (Import Duty) से परेशान थी। राष्ट्रपति ट्रंप की सख्त और एकतरफा व्यापार नीतियों का सीधा असर आम अमेरिकी नागरिक की जेब पर पड़ रहा था। इसी गुस्से का नतीजा रहा कि मतदाताओं ने इस बार डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में बंपर मतदान किया। कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स की इस ऐतिहासिक बढ़त के बाद अब ट्रंप प्रशासन के मनमाने फैसलों पर करारी निगरानी और रोक लगनी तय मानी जा रही है।
भारत के हाथ लगी बड़ी बाजी: ट्रेड डील में मजबूत होगी स्थिति?
व्यापार विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी कांग्रेस में पावर बैलेंस (Power Balance) बदलने से भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं का पूरा समीकरण बदल सकता है। अब तक ट्रंप प्रशासन अन्य देशों पर टैरिफ का दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाता रहा है। लेकिन अब घरेलू मोर्चे पर कमजोर हुए ट्रंप के लिए भारत पर मनमाना दबाव बनाना आसान नहीं होगा। भारत को अब टेबल पर अपनी शर्तों को रखने और एक बेहतर 'ट्रेड डील' हासिल करने के लिए जबर्दस्त सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) मिल गई है।
जापान और साउथ कोरिया के लिए राहत की सांस: अरबों डॉलर के वादों पर फिर से होगा मंथन
ट्रंप की सख्त टैरिफ चेतावनियों के आगे दबाव में आकर जापान ने अमेरिका में 550 अरब डॉलर और साउथ कोरिया ने 350 अरब डॉलर के भारी-भरकम निवेश की घोषणाएं की थीं। अब अमेरिकी राजनीति में आए इस बड़े मोड़ के बाद, इन एशियाई दिग्गजों को राहत की सांस मिली है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब दोनों ही देश अपने इस विशालकाय निवेश के वादों पर दोबारा विचार कर सकते हैं और ट्रंप के व्यापारिक दबाव को चुनौती दे सकते हैं।
