
वाशिंगटन/डेट्रॉइट (मिशिगन): अमेरिकी राजनीति के गलियारों से एक ऐसी सनसनीखेज और अभूतपूर्व खबर सामने आई है, जिसने वाशिंगटन से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक दिग्गजों को हैरान कर दिया है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कड़े विरोध, विवादित बयानों और आक्रामक प्रचार के बावजूद अब्दुल अल-सैयद ने अमेरिकी इतिहास की सबसे चौंकाने वाली जीत दर्ज की है। इस जीत के साथ वे अमेरिकी संसद के उच्च सदन (सीनेट) में कदम रखने वाले पहले मुस्लिम सांसद बन गए हैं। मिशिगन सीट पर हुए इस कांटे के मुकाबले में उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के बड़े चेहरे और ट्रंप के खास करीबी माइक रोजर्स को करारी शिकस्त दी है।
अब्दुल अल-सैयद अपनी पत्नी डॉ. सारा जुकाकू के साथ. सोर्स: JEFF
'जिहादी' तंज से लेकर मेटल डिटेक्टर का तंज: जब ट्रंप का हर वार पड़ा उल्टा
चुनाव प्रचार के दौरान मिशिगन का सियासी माहौल पूरी तरह गर्म रहा। डोनाल्ड ट्रंप और उनके समर्थकों ने अब्दुल अल-सैयद के नाम और उनके धर्म को निशाना बनाते हुए जमकर तीखे हमले किए। यहाँ तक कि ट्रंप ने सार्वजनिक मंचों से उन्हें "जिहादी" तक कह डाला और तंज कसा कि सीनेट में एंट्री पाने के लिए उन्हें कड़ी चेकिंग और मेटल डिटेक्टर से होकर गुजरना पड़ेगा।
लेकिन अब्दुल अल-सैयद ने इन व्यक्तिगत हमलों का बेहद परिपक्व और शांत तरीके से जवाब दिया। उन्होंने जनता के बीच जाकर कहा कि उनके विरोधी महंगाई, गैस की आसमान छूती दरों और रोजमर्रा के सामानों के दामों जैसे बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए नफरत का सहारा ले रहे हैं। अंततः मिशिगन की जनता ने विभाजनकारी बयानबाजी को पूरी तरह खारिज करते हुए उनके विकासपरक दृष्टिकोण पर अपनी मुहर लगा दी।
चर्च से सिनेगॉग तक 18 महीने की पदयात्रा: जानिए कैसे बदला जनता का मूड
ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद सीनेटर बने अल-सैयद ने एक बेहद भावुक भाषण दिया, जिसने हर किसी का दिल जीत लिया। उन्होंने जनता का आभार जताते हुए कहा, "आपने मुझे सिर्फ सुना ही नहीं, बल्कि अपने घरों, अपने चर्चों और यहूदी प्रार्थना स्थलों (सिनेगॉग) में दिल से पनाह दी।"
पेशे से डॉक्टर और प्रगतिशील नेता अल-सैयद की यह सफलता किसी चमत्कार से कम नहीं है। उन्होंने बीते डेढ़ साल में मिशिगन के बड़े-बड़े शहरों से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों तक लगातार जमीनी अभियान चलाया। जब विरोधी उन पर निजी कीचड़ उछाल रहे थे, तब जनता के साथ सीधे संवाद ने ही उन्हें यह एतिहासिक जनमत दिलाया।
भारत से जुड़ा है गहरा रिश्ता: कर्नाटक के इस शाही और राजनीतिक घराने की बहु हैं उनकी पत्नी
अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर की इस धमाकेदार जीत की गूंज भारत में भी सुनाई दे रही है। इसकी वजह उनका भारत से जुड़ा एक बेहद मजबूत और ऐतिहासिक पारिवारिक नाता है। अल-सैयद की पत्नी डॉ. सारा जुकाकू एक जानी-मानी साइकियाट्रिस्ट (मनोचिकित्सक) हैं, जिनका परिवार मूल रूप से भारत के कर्नाटक राज्य से है।
सारा का परिवार कर्नाटक के तटीय शहर मंगलुरु से लगभग 140 किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्र का रहने वाला है। सारा का परिवार कर्नाटक की राजनीति में बड़ा नाम रहा है—उनके दादा शमशुद्दीन तत्कालीन मुख्यमंत्री बीडी जत्ती के शासनकाल में मैसूर राज्य (अब कर्नाटक) में उप-वित्त मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
"अरबी होने से ज्यादा भारतीय महसूस करता हूँ": जब मिशिगन यूनिवर्सिटी से शुरू हुई यह प्रेम कहानी
अब्दुल अल-सैयद खुद एक प्रतिष्ठित रोड्स स्कॉलर रहे हैं। उनकी और सारा की पहली मुलाकात मिशिगन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान हुई थी, जो बाद में जीवनभर के हमसफर के रिश्ते में बदल गई। दक्षिण भारतीय खान-पान, रहन-सहन और संस्कृति के साथ अल-सैयद का जुड़ाव इतना गहरा है कि वे इस पर अक्सर गर्व से बात करते हैं।
एक इंटरव्यू में अपनी पर्सनल लाइफ पर दिल खोलकर बात करते हुए उन्होंने कहा था, "मेरी शादी को 20 साल से ज्यादा हो चुके हैं और मैं पूरी तरह से दक्षिण भारतीय पारिवारिक माहौल में ढल चुका हूँ। अगर ईमानदारी से कहूँ, तो मैं खुद को अरबी होने से ज्यादा भारतीय महसूस करता हूँ।"
हेली स्टीवंस से लेकर माइक रोजर्स तक: दिग्गजों का सियासी करियर किया पस्त
अब्दुल अल-सैयद का राजनीतिक सफर चुनौतियों से भरा रहा है। वे वेन काउंटी के स्वास्थ्य निदेशक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। इस साल की शुरुआत में हुए डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनाव में उन्होंने पार्टी की सबसे पसंदीदा दावेदार हेली स्टीवंस को हराकर पहला बड़ा उलटफेर किया था।
इसके बाद मुख्य चुनाव में उनका सीधा मुकाबला पूर्व कांग्रेसी माइक रोजर्स से था, जिन्हें खुद डोनाल्ड ट्रंप का खुला समर्थन हासिल था। 2024 के चुनाव में बेहद मामूली अंतर (0.3%) से चूकने वाले रोजर्स इस बार पूरी ताकत में थे, लेकिन अल-सैयद की आंधी के आगे रिपब्लिकन रणनीति ताश के पत्तों की तरह ढह गई। इस ऐतिहासिक जीत के साथ डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी संसद के उच्च सदन में अपना दबदबा और मजबूत कर लिया है।
