नई दिल्ली। रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले भारत जैसे देशों को अमेरिका की ओर से फिलहाल बड़ी राहत मिली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी ऊर्जा आयात को लेकर प्रस्तावित कड़े दंडात्मक टैरिफ पर 60 दिनों के लिए रोक लगा दी है। इस फैसले से भारत और चीन जैसे देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाने का खतरा फिलहाल टल गया है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था, तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था को कुछ समय के लिए राहत मिलने की उम्मीद है।
रूसी तेल पर अमेरिका का बड़ा फैसला
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट यानी ग्राहम एक्ट के कुछ प्रावधानों को अस्थायी रूप से लागू न करने का फैसला किया है। इस कानून के तहत रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर भारी अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान था। भारत भी उन प्रमुख देशों में शामिल है, जिन पर इस कार्रवाई का असर पड़ सकता था। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के मुताबिक, प्रशासन ने संभावित आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभावों का आकलन करने के लिए 60 दिनों का समय लिया है। इस दौरान यह देखा जाएगा कि रूसी ऊर्जा आयात पर सख्ती करने से अंतरराष्ट्रीय बाजार, ईंधन की उपलब्धता और अमेरिका के सहयोगी देशों पर क्या असर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी कांग्रेस में सितंबर में पारित कानून के तहत 18 अक्टूबर से रूस के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े आयातक देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की संभावना थी। हालांकि, ट्रंप प्रशासन के कार्यकारी आदेश के बाद यह कार्रवाई फिलहाल टल गई है। आदेश में राहत की अवधि के दौरान समीक्षा किए जाने की बात कही गई है। इसलिए इसे स्थायी छूट मानना सही नहीं होगा।
छूट के पीछे क्या है अमेरिका की रणनीति?
रूसी तेल पर सख्ती को फिलहाल टालने के पीछे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को अचानक संकट से बचाना एक अहम वजह मानी जा रही है। दुनिया के कई हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ है। रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है, वहीं पश्चिम एशिया में तनाव और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बनी हुई हैं। अगर रूस से तेल की खरीद अचानक कम हो जाती या उस पर कड़े प्रतिबंध लागू हो जाते, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती थी। इससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आने और ईंधन आपूर्ति पर दबाव बढ़ने का खतरा रहता। ऐसी स्थिति में भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश को भी महंगे आयात का सामना करना पड़ सकता था। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि भारत अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन किसी देश के लिए अपने पुराने आपूर्तिकर्ताओं को अचानक बदलना आसान नहीं होता। ऊर्जा की आपूर्ति, रिफाइनरियों की जरूरत और खरीद समझौतों को नए सिरे से व्यवस्थित करने में समय लगता है। रुबियो ने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार भी बताया।
भारत को तुरंत क्या फायदा होगा?
इस फैसले का सबसे बड़ा तात्कालिक फायदा यह है कि भारत पर प्रस्तावित भारी अतिरिक्त टैरिफ का खतरा फिलहाल टल गया है। यदि ये टैरिफ लागू होते, तो भारतीय उत्पादों के अमेरिकी बाजार में पहुंचने की लागत बढ़ सकती थी। इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा और व्यापार पर दबाव पड़ने की आशंका थी। दूसरा फायदा तेल आपूर्ति से जुड़ा है। भारतीय रिफाइनरियों को अपनी मौजूदा खरीद और आपूर्ति व्यवस्था में अचानक बड़े बदलाव करने की जरूरत से कुछ समय की राहत मिल सकती है। रूसी कच्चा तेल कई बार दूसरे विकल्पों की तुलना में आकर्षक कीमत पर उपलब्ध होता है। हालांकि, वास्तविक बचत तेल की कीमत, ढुलाई, बीमा, भुगतान व्यवस्था और अन्य खर्चों पर निर्भर करती है। तीसरा फायदा घरेलू ईंधन बाजार को अचानक पड़ने वाले दबाव से बचाने के रूप में सामने आ सकता है। यदि भारत को कम समय में दूसरे देशों से बड़ी मात्रा में तेल खरीदना पड़ता, तो लागत और आपूर्ति दोनों पर असर पड़ सकता था। फिलहाल मिली राहत से तेल कंपनियों को वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की व्यवस्था करने और अपनी रणनीति पर विचार करने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत घट जाएंगी। घरेलू ईंधन की कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रुपये और डॉलर की विनिमय दर, कर और तेल कंपनियों की लागत शामिल हैं। इसलिए 60 दिनों की छूट को कीमतों में कमी की गारंटी नहीं माना जा सकता।
क्या भारत अब भी रूसी तेल खरीद सकेगा?
अमेरिका के इस फैसले से भारत को रूसी तेल खरीदने से पूरी तरह रोकने वाली कोई नई व्यवस्था अपने आप लागू नहीं हो जाती। इसका प्रमुख असर प्रस्तावित दंडात्मक टैरिफ के खतरे को अस्थायी रूप से टालने से जुड़ा है। भारतीय कंपनियों को तेल खरीदने से संबंधित अन्य लागू नियमों, प्रतिबंधों और भुगतान संबंधी शर्तों का पालन करना होगा। भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। देश की तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। ऐसे में किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग देशों से तेल खरीदना भारत की ऊर्जा रणनीति का हिस्सा है। रूसी तेल की खरीद में अचानक बड़ा बदलाव करने से लागत और आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। अगले 60 दिनों में भारत के सामने यह अवसर रहेगा कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों, वैश्विक कीमतों और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए आगे की रणनीति पर विचार करे। दूसरी ओर, अमेरिका भी यह आकलन कर सकता है कि रूसी ऊर्जा आयात पर दबाव बढ़ाने से रूस पर कितना प्रभाव पड़ेगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान हो सकता है।
अमेरिका में ट्रंप के फैसले का विरोध
रूसी तेल पर सख्ती को टालने के फैसले का अमेरिका में ही विरोध शुरू हो गया है। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के कुछ सांसदों का तर्क है कि रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर दबाव कम करने से मॉस्को की आय पर रोक लगाने की पश्चिमी कोशिशें कमजोर पड़ सकती हैं। मैसाचुसेट्स की डेमोक्रेटिक सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने ट्रंप की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने कांग्रेस की मंशा को नजरअंदाज किया है। उन्होंने सांसदों से इस फैसले को बदलने की अपील की। विरोध करने वाले नेताओं का मानना है कि रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई उसके युद्ध से जुड़े खर्चों को समर्थन दे सकती है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने भी प्रतिबंधों में ढील देने पर नाराजगी जताई। उनका कहना है कि रूस पर आर्थिक दबाव कम होने से उसे फायदा होगा और यूक्रेन के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इस तरह अमेरिकी प्रशासन का फैसला केवल व्यापार या तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों की रणनीति पर भी पड़ सकता है।
60 दिन बाद क्या होगा?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि समीक्षा अवधि पूरी होने के बाद अमेरिका क्या कदम उठाएगा। प्रशासन रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है, राहत को जारी रखने का फैसला कर सकता है या नियमों में बदलाव कर सकता है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर अभी किसी एक नतीजे को निश्चित नहीं माना जा सकता। भारत के लिए यह अवधि इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दौरान उसे ऊर्जा आपूर्ति में स्थिरता बनाए रखने के साथ अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों पर भी ध्यान देना होगा। यदि आगे चलकर टैरिफ लागू होते हैं, तो भारतीय निर्यातकों और कारोबार पर असर पड़ सकता है। वहीं, रूसी तेल की खरीद में अचानक कटौती होने पर आयात लागत और ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी। कुल मिलाकर, ट्रंप के फैसले ने भारत को तत्काल राहत और अतिरिक्त तैयारी का समय दिया है। लेकिन यह राहत स्थायी समाधान नहीं है। आने वाले दिनों में अमेरिका की समीक्षा, रूस-यूक्रेन युद्ध की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की चाल तय करेगी कि भारत को आगे कितनी राहत मिलती है।
