नई दिल्ली। डिजिटल भुगतान को देशभर में बढ़ावा देने वाली UPI व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। क्या आने वाले समय में दुकानदारों और कारोबारियों को UPI से मिलने वाले भुगतान पर शुल्क देना पड़ सकता है? क्या अब तक मुफ्त चली आ रही डिजिटल भुगतान सुविधा हमेशा के लिए मुफ्त नहीं रहेगी? इन सवालों के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट कर दिया है कि कारोबारियों को कभी भी यह स्थायी आश्वासन नहीं दिया गया था कि UPI लेनदेन पर हमेशा शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू रहेगा। सरकार ने 2,000 रुपये से अधिक के कुछ UPI लेनदेन पर MDR लगाने की प्रस्तावित व्यवस्था का भी बचाव किया है।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में कहा कि मुफ्त UPI भुगतान की व्यवस्था को स्थायी अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता। सरकार के मुताबिक, कारोबारियों को लगातार शून्य MDR की सुविधा जारी रखने का कोई विशेष आश्वासन नहीं दिया गया था। इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सरकार की ओर से मिलने वाली सब्सिडी भी अनिवार्य नहीं थी, बल्कि यह सरकार के विवेक पर निर्भर करती थी।
सरकार ने यह जवाब चार नवंबर को दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में दिया। इसमें बताया गया कि MDR की संशोधित व्यवस्था पर विचार अचानक नहीं किया गया था। इसे लागू करने से काफी पहले संबंधित विषय पर चर्चा शुरू हो गई थी और अंतिम निर्णय लेने से पहले संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श भी किया गया था।
यह मामला वकील अंजन दत्ता की ओर से दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में MDR की संशोधित व्यवस्था को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस व्यवस्था से संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपनी व्यवस्था को उचित ठहराया है।
2,000 रुपये तक के भुगतान पर राहत, बड़े लेनदेन पर लग सकता है शुल्क
सरकार ने 2,000 रुपये की सीमा निर्धारित करने के पीछे छोटे कारोबारियों और आम ग्राहकों के हितों का तर्क दिया है। केंद्र के अनुसार, रोजमर्रा की खरीदारी और छोटे मूल्य के खुदरा लेनदेन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ना चाहिए। इसी उद्देश्य से 2,000 रुपये तक के भुगतान और इससे अधिक मूल्य के कुछ लेनदेन के लिए अलग-अलग व्यवस्था रखने का प्रावधान उचित माना गया है।
सरकार का कहना है कि बड़े मूल्य के लेनदेन करने वाले कारोबारियों की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर होती है। इसलिए ऐसे लेनदेन पर मामूली शुल्क लगाने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। इससे छोटे दुकानदारों और आम खुदरा कारोबारियों पर अतिरिक्त बोझ डालने की आवश्यकता नहीं होगी।
हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित व्यवस्था के तहत हर UPI भुगतान पर शुल्क लगाए जाने की बात नहीं है। शुल्क की व्यवस्था लेनदेन की रकम, भुगतान के माध्यम और कारोबारी श्रेणी के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। ऐसे में ग्राहकों और व्यापारियों के लिए यह समझना जरूरी है कि UPI भुगतान पर शुल्क से जुड़ी व्यवस्था सभी लेनदेन के लिए एक समान नहीं है।
UPI और RuPay कार्ड को अलग-अलग रखने के पीछे क्या है वजह?
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने UPI और RuPay डेबिट कार्ड के लिए अलग-अलग शुल्क व्यवस्था रखने का भी बचाव किया। सरकार का तर्क है कि दोनों भुगतान प्रणालियों की तकनीकी संरचना, कारोबारी संचालन और लागत का आधार एक जैसा नहीं है। इसलिए दोनों के लिए एक समान नियम लागू करना जरूरी नहीं है।
केंद्र के मुताबिक, RuPay डेबिट कार्ड पर शून्य MDR की व्यवस्था जारी रखने का उद्देश्य घरेलू कार्ड नेटवर्क को प्रोत्साहित करना है। सरकार का मानना है कि देश में विकसित भुगतान नेटवर्क को बढ़ावा देने के लिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक हो सकती है। वहीं UPI की भुगतान प्रणाली और उससे जुड़ी लागत का ढांचा अलग होने के कारण इसके लिए अलग नीतिगत व्यवस्था बनाई जा सकती है।
कारोबारियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं मानती सरकार
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि MDR की संशोधित व्यवस्था कारोबारियों के व्यवसाय करने के अधिकार पर कोई अनुचित प्रतिबंध नहीं लगाती। संविधान के तहत किसी कारोबारी को यह गारंटी नहीं दी गई है कि उसके व्यवसाय से जुड़ी सभी सेवाएं और सुविधाएं हमेशा मुफ्त उपलब्ध कराई जाएंगी।
सरकार के अनुसार, किसी शुल्क के कारण व्यापारी के मुनाफे में कमी आना अपने आप में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। कारोबार से संबंधित सेवाओं की लागत और भुगतान प्रणाली के संचालन के लिए शुल्क निर्धारित करना अपने आप में असंवैधानिक नहीं है।
केंद्र ने यह भी कहा कि व्यापारी MDR का बोझ सीधे ग्राहकों पर नहीं डाल सकते। यानी भुगतान प्रणाली से जुड़ा शुल्क लागू होने की स्थिति में कारोबारियों को उसका हिसाब अपनी कारोबारी व्यवस्था के अनुसार रखना होगा। सरकार का पक्ष है कि केवल शुल्क लगने से किसी कारोबारी के व्यवसाय करने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होता।
MDR सरकार का टैक्स नहीं, बैंकों के बीच कारोबारी भुगतान: केंद्र
MDR लगाने के अधिकार को लेकर उठाए गए सवालों पर केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कानूनी तर्क दिया है। सरकार के मुताबिक, मर्चेंट डिस्काउंट रेट न तो सरकारी कर है और न ही सरकार की ओर से वसूला जाने वाला कोई शुल्क। यह भुगतान प्रणाली से जुड़े बैंकों और कारोबारियों के बीच होने वाला एक कारोबारी भुगतान है।
सरकार ने बताया कि संबंधित बैंक के साथ हुए समझौते के तहत व्यापारी के खाते में भुगतान की जाने वाली रकम से MDR काटा जाता है। इसलिए इसे सरकारी कर या सरकारी राजस्व के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
केंद्र ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10A का हवाला देते हुए कहा कि सरकार की भूमिका मुख्य रूप से यह निर्धारित करने तक सीमित है कि किन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर शुल्क से छूट दी जाएगी।
सरकार के अनुसार, जिन लेनदेन को इस छूट के दायरे से बाहर रखा गया है, उन पर MDR निर्धारित करने और उसके वितरण की जिम्मेदारी नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के अधिकार क्षेत्र में आती है। NPCI भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अनुमति के तहत UPI भुगतान प्रणाली का संचालन करता है।
इसी आधार पर केंद्र ने कहा कि चूंकि सरकार स्वयं MDR निर्धारित नहीं करती और न ही इसकी वसूली करती है, इसलिए संविधान का अनुच्छेद 265 इस मामले में लागू नहीं होता। संविधान का यह अनुच्छेद कहता है कि कानून के अधिकार के बिना कोई कर न तो लगाया जा सकता है और न ही वसूला जा सकता है।
मुफ्त UPI व्यवस्था पर सरकार ने खर्च किए 8,730 करोड़ रुपये
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मुफ्त डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़े आर्थिक खर्च का भी विवरण दिया। सरकार का कहना है कि शून्य MDR लागू होने से डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया की वास्तविक लागत समाप्त नहीं हुई थी। इसके बजाय इस लागत का आर्थिक बोझ सरकार और भुगतान प्रणाली से जुड़े दूसरे पक्षों पर पड़ रहा था।
हलफनामे के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021-22 से वित्त वर्ष 2024-25 के बीच शून्य MDR वाले लेनदेन को समर्थन देने के लिए अधिग्रहण करने वाले बैंकों को कुल 8,730 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन दिए गए। यह राशि डिजिटल भुगतान व्यवस्था को बिना MDR के संचालित रखने के लिए दी गई थी।
हालांकि, सरकार ने संसदीय स्थायी समितियों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह भी बताया कि दी गई सब्सिडी UPI व्यवस्था की अनुमानित वार्षिक परिचालन लागत का केवल एक छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाई। केंद्र ने इस लागत का अनुमान लगभग 20,700 करोड़ रुपये लगाया है।
इस आंकड़े के जरिए सरकार ने यह समझाने की कोशिश की है कि मुफ्त डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लंबे समय तक चलाने के लिए केवल सरकारी प्रोत्साहन पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं हो सकता। भुगतान प्रणाली के संचालन में बैंकों, तकनीकी ढांचे और अन्य संबंधित संस्थाओं को लगातार खर्च करना पड़ता है।
साइबर सुरक्षा से लेकर तकनीकी विकास तक के लिए जरूरी है स्थायी वित्तपोषण
केंद्र सरकार का कहना है कि भारत में डिजिटल भुगतान का विस्तार लगातार हो रहा है। ऐसे में UPI जैसी बड़ी भुगतान प्रणाली को सुरक्षित और प्रभावी बनाए रखने के लिए स्थायी वित्तपोषण मॉडल विकसित करना जरूरी है।
सरकार ने अपने जवाब में साइबर सुरक्षा, डिजिटल धोखाधड़ी रोकने, भुगतान संबंधी विवादों के निपटारे, तकनीकी विकास और डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे के विस्तार को महत्वपूर्ण जरूरत बताया है। इन सभी कार्यों के लिए नियमित निवेश और पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
सरकार के अनुसार, यदि भुगतान व्यवस्था की पूरी लागत का बोझ केवल सब्सिडी के माध्यम से उठाया जाता है, तो लंबे समय तक इसका संचालन चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए शुल्क और प्रोत्साहन से जुड़ी ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जिससे डिजिटल भुगतान प्रणाली आर्थिक रूप से टिकाऊ बनी रहे।
आगे क्या होगा और आम ग्राहकों पर कितना पड़ेगा असर?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल केंद्र सरकार के जवाब से यह स्पष्ट हुआ है कि सरकार UPI पर शून्य MDR को कारोबारियों का स्थायी अधिकार नहीं मानती। हालांकि, इस दलील का अर्थ यह नहीं है कि अब सभी ग्राहकों को UPI से भुगतान करने पर शुल्क देना होगा। सरकार ने अपने हलफनामे में मुख्य रूप से कारोबारियों से जुड़े MDR और अलग-अलग मूल्य के लेनदेन की व्यवस्था का बचाव किया है।
फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि संशोधित MDR व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या रहता है और कारोबारियों के मौलिक अधिकारों से संबंधित याचिका पर आगे क्या निर्णय आता है। केंद्र सरकार ने अपनी दलीलों के जरिए यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि डिजिटल भुगतान की सुविधा मुफ्त रखना और उसे लंबे समय तक आर्थिक रूप से संचालित करना दो अलग-अलग विषय हैं।
कुल मिलाकर, UPI भुगतान को लेकर केंद्र सरकार के इस रुख ने डिजिटल लेनदेन की लागत, कारोबारियों की जिम्मेदारी और मुफ्त भुगतान व्यवस्था के भविष्य पर नई बहस छेड़ दी है। सरकार का जोर इस बात पर है कि डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत, सुरक्षित और टिकाऊ बनाए रखने के लिए वित्तीय व्यवस्था का स्थायी समाधान जरूरी है।
