erer | Source: ereपटना। बिहार की पहचान केवल यहां की ऐतिहासिक विरासत, संस्कृति और परंपराओं से ही नहीं, बल्कि यहां के खास खान-पान से भी जुड़ी है। राज्य में कई ऐसी मिठाइयां हैं, जिनका स्वाद और पहचान दूर-दूर तक मशहूर है। तिलंगा जी का पेड़ा, बड़हिया का रसगुल्ला, पटना का लौंगलता और चंद्रकला जैसी मिठाइयों के बीच नालंदा जिले के सिलाव का खाजा अपनी अलग पहचान रखता है। यह एक ऐसी सूखी मिठाई है, जिसका नाम सुनते ही लोगों के मुंह में पानी आ जाता है। खाजा का नाम भी अपने आप में खास है। इसे आम बोलचाल में 'खा जा' यानी खा जाओ के अर्थ से जोड़कर देखा जाता है।

बिहार में खाजा केवल खाने-पीने की मिठाई नहीं है, बल्कि शादी-विवाह और पारिवारिक आयोजनों की परंपरा का अहम हिस्सा बन चुका है। खासकर तिलक और विवाह समारोहों में इसकी मौजूदगी को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। नालंदा जिले के सिलाव में तैयार होने वाला खाजा अपनी गुणवत्ता और स्वाद के लिए प्रसिद्ध है। यहां के पारंपरिक कारीगर इसे विशेष तरीके से तैयार करते हैं। इसकी खासियत इसकी परतदार बनावट और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाली सूखी प्रकृति है।

तिलक और शादी की रस्मों में खाजा की खास जगह

बिहार में शादी-ब्याह के दौरान खाजा की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तिलक समारोह में दूल्हे के घर पहुंचने वाले उपहारों में इसकी मौजूदगी को जरूरी माना जाता है। घर में फ्रिज, एसी और अन्य महंगे उपहार पहुंच जाएं, लेकिन यदि खाजा नहीं आया तो रिश्तेदार और आस-पड़ोस के लोग इसके बारे में पूछ सकते हैं। इसकी वजह यह है कि खाजा सिर्फ मेहमानों को खिलाने वाली मिठाई नहीं, बल्कि रिश्तेदारी निभाने और पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है।

तिलक के बाद परिवार की ओर से आस-पड़ोस, गोतिया और रिश्तेदारों के घर बैना के रूप में खाजा पहुंचाया जाता है। इस परंपरा में खाजा की टोकरी का विशेष महत्व होता है। परिवार के लोग इसे उपहार के तौर पर अपने परिचितों और संबंधियों तक पहुंचाते हैं। इस तरह मिठाई के साथ रिश्तों में मिठास बांटने की परंपरा भी जुड़ी हुई है।

जब लड़के पक्ष के लोग बारात लेकर लड़की के घर पहुंचते हैं, तब उनके साथ ले जाए जाने वाले उपहारों में भी खाजा शामिल रहता है। विवाह समारोह के दौरान इसकी टोकरी मेहमानों के बीच आकर्षण का केंद्र बनती है। वहीं, शादी के बाद जब लड़की की विदाई होती है तो दूल्हे को ससुराल से मिलने वाले सामान के साथ गाड़ी में टोकरी भरकर खाजा भी दिया जाता है। इसके बाद लड़के पक्ष के लोग भी अपने रिश्तेदारों और परिचितों के यहां बैना भेजने के लिए इसी मिठाई का इस्तेमाल करते हैं।

अनंत सिंह की बेटी शिवांगी की शादी में भी पहुंचेगा सिलाव का खाजा

बिहार के बाहुबली विधायक अनंत सिंह की बेटी शिवांगी की शादी को लेकर भी खाजा की यह परंपरा चर्चा में है। खबर के मुताबिक, बिहटा निवासी दूल्हे ऋषिकेश के घर तिलक और विवाह के अवसर पर खाजा का आना-जाना तय है। शादी से जुड़े अलग-अलग समारोहों में जब लड़की और लड़के पक्ष के लोग एकत्र होंगे, तब खाजा की टोकरी भी इस पारंपरिक आयोजन का हिस्सा रहेगी।

अनंत सिंह भी अपने समधियाने में खाजा जरूर भेजेंगे। बिहार की पारिवारिक परंपराओं में तिलक और विवाह के दौरान मिठाइयों का आदान-प्रदान महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में खाजा की मौजूदगी इस परंपरा को खास बनाती है। विवाह समारोह में दूसरी मिठाइयों के साथ खाजा को भी उतना ही महत्व दिया जाता है। इसकी टोकरी रिश्तेदारों और मेहमानों तक पहुंचाई जाती है।

मैदा, गेहूं का आटा, घी और चीनी से तैयार होती है यह मिठाई

सिलाव का खाजा अपनी खास सामग्री और बनाने की पारंपरिक विधि के लिए जाना जाता है। इसे तैयार करने में गेहूं का आटा, मैदा, चीनी, घी या रिफाइंड तेल, इलायची और सौंफ का इस्तेमाल किया जाता है। स्वाद के अनुसार यह मीठा और नमकीन, दोनों तरह से बनाया जाता है। इसकी परतदार बनावट इसे दूसरी मिठाइयों से अलग पहचान देती है।

खाजा बनाने के लिए सबसे पहले आटा, मैदा, पिसी हुई सौंफ और इलायची को एक साथ मिलाया जाता है। इसके बाद इस मिश्रण को अच्छी तरह गूंथा जाता है। आटा तैयार होने के बाद उसे बेलकर बेहद पतली परतों में बनाया जाता है। इन परतों को एक के ऊपर एक रखकर खाजा का खास आकार तैयार किया जाता है। इसकी पारंपरिक पहचान 52 परतों वाली मिठाई के रूप में है।

52 परतों से तैयार होता है खाजा, फिर चाशनी में डुबोया जाता है

खाजा बनाने की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण काम उसकी परतें तैयार करना होता है। इसके लिए गूंथे हुए आटे को बेलकर पतली-पतली परतें बनाई जाती हैं। इसके बाद एक के ऊपर एक कुल 52 परतों को व्यवस्थित किया जाता है। फिर इन्हें घी या रिफाइंड तेल में डालकर अच्छी तरह तला जाता है।

तलने के दौरान जब खाजा हल्का सुनहरा हो जाता है तो उसे बाहर निकाल लिया जाता है। इसके बाद पहले से तैयार चीनी की चाशनी में डुबोया जाता है। चाशनी में डूबने के बाद इसकी परतों में मिठास समा जाती है और यह खाने के लिए तैयार हो जाता है। इसकी खास बनावट के कारण खाते समय परतें आसानी से खुलती हैं। यही वजह है कि खाजा का स्वाद और बनावट इसे दूसरी मिठाइयों से अलग बनाते हैं।

घर के हलवाई नहीं बना पाते खाजा, विशेष कारीगरों की होती है जरूरत

शादी-विवाह में आमतौर पर परिवार के लोग हलवाई बुलाकर रसगुल्ला, गुलाबजामुन और दूसरी मिठाइयां तैयार करवा लेते हैं। लेकिन खाजा बनाना सामान्य मिठाई बनाने जितना आसान नहीं है। इसके लिए विशेष कौशल और अनुभव की जरूरत होती है। इसकी 52 परतें तैयार करने से लेकर उन्हें सही तरीके से तलने और चाशनी में डालने तक की प्रक्रिया में कारीगरों की विशेषज्ञता महत्वपूर्ण होती है।

इसी कारण शादी के घरों में सामान्य हलवाई से खाजा तैयार कराने के बजाय इसके विशेष कारीगरों से संपर्क किया जाता है। नालंदा जिले में विवाह समारोह होने पर परिवारों को खाजा की व्यवस्था के लिए ज्यादा परेशानी नहीं होती, क्योंकि सिलाव पास में ही स्थित है और वहां इसके प्रसिद्ध कारीगर उपलब्ध हैं।

सिलाव के साथ पटना में भी बढ़ी खाजा की पहचान

नालंदा जिले के सिलाव को खाजा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां के कारीगर लंबे समय से इस मिठाई को तैयार करते आ रहे हैं। सिलाव के खाजा की लोकप्रियता के कारण बिहार के दूसरे हिस्सों में भी इसकी मांग बनी रहती है। पिछले कुछ वर्षों में राजधानी पटना भी खाजा कारीगरों का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरी है।

पटना में जादूघर के आसपास कुछ ऐसी दुकानें हैं, जहां खाजा बनाने वाले कारीगर लगातार इस मिठाई को तैयार करते हैं। यहां खाजा को विशेष तरीके से टोकरियों में पैक करके बेचा जाता है, ताकि इसे तिलक और शादी-विवाह जैसे आयोजनों में आसानी से ले जाया जा सके। इसकी आकर्षक पैकिंग और पारंपरिक महत्व के कारण यह विवाह समारोहों में उपहार के रूप में भी खूब पसंद किया जाता है।

मिठाई से बढ़कर बिहार की सांस्कृतिक परंपरा है खाजा

बिहार में खाजा की लोकप्रियता का आधार केवल उसका स्वाद नहीं है। यह सामाजिक और पारिवारिक परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। तिलक से लेकर विवाह और विदाई तक, अलग-अलग रस्मों में इसकी टोकरी रिश्तेदारों और परिचितों तक पहुंचाई जाती है। सिलाव के कारीगरों की विशेष कला ने इस मिठाई को अलग पहचान दी है। 52 परतों में तैयार होने वाला खाजा आज भी बिहार के पारंपरिक खान-पान और शादी-ब्याह की रस्मों का खास हिस्सा बना हुआ है। यही वजह है कि बड़े आयोजन हों या सामान्य पारिवारिक विवाह, खाजा की मांग और महत्व दोनों बरकरार हैं।