ere | Source: erereनई दिल्ली। कुछ महीने पहले तक दुनिया की बड़ी तकनीकी कंपनियां और निवेशक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को मानव इतिहास की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति के रूप में देख रहे थे। दावा किया जा रहा था कि यह तकनीक उद्योगों की कार्यप्रणाली बदल देगी, कारोबार को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगी और आम इंसान की जिंदगी को पहले से कहीं अधिक आसान और आधुनिक बना देगी। इसी उम्मीद में दुनिया की दिग्गज कंपनियों और निवेशकों ने एआई के विकास, डेटा सेंटर, अत्याधुनिक चिप और तकनीकी ढांचे पर खरबों डॉलर लगा दिए। लेकिन अब इस चमकदार तस्वीर पर सवाल उठने लगे हैं। एआई में भारी निवेश करने वाली कंपनियों के सामने मुनाफे को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है और शेयर बाजार में तकनीकी कंपनियों के शेयरों की तेज बिकवाली ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।

अमेरिका से लेकर चीन और दक्षिण कोरिया तक एआई से जुड़े कारोबार पर दबाव दिखाई देने लगा है। जिन देशों और कंपनियों ने इस तकनीक को भविष्य की आर्थिक ताकत मानकर सबसे ज्यादा निवेश किया, उनके सामने अब अपने निवेश की लागत निकालने की चुनौती खड़ी हो रही है। सवाल यह है कि क्या एआई को लेकर दुनिया ने जरूरत से ज्यादा उम्मीदें लगा ली थीं? क्या भारी निवेश के बावजूद यह तकनीक कंपनियों को अपेक्षित कमाई नहीं दे पा रही है? और यदि एआई से जुड़ा कारोबार अनुमान के मुताबिक आगे नहीं बढ़ा, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और रोजगार पर कितना गंभीर हो सकता है?

एआई के बड़े सपने पर क्यों मंडराने लगा संकट?

एआई को लेकर दुनिया भर में जिस तेजी से उत्साह बढ़ा, उसी गति से इसमें निवेश भी हुआ। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, OpenAI, Nvidia और Meta जैसी बड़ी कंपनियों ने इस तकनीक को अपने कारोबार का प्रमुख हिस्सा बनाया। एआई मॉडल विकसित करने, उन्हें प्रशिक्षित करने और करोड़ों लोगों तक उनकी सेवाएं पहुंचाने के लिए विशाल डेटा सेंटर, शक्तिशाली कंप्यूटर और अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर चिप की जरूरत पड़ती है। इन सभी पर कंपनियों ने भारी रकम खर्च की।

शुरुआत में निवेशकों को उम्मीद थी कि एआई आधारित सेवाओं से कंपनियों की कमाई तेजी से बढ़ेगी। कारोबार में उत्पादकता बढ़ेगी, कर्मचारियों की जरूरत और काम करने के तरीके में बदलाव आएगा तथा नए बाजार तैयार होंगे। लेकिन अब निवेश की तुलना में मिलने वाले आर्थिक लाभ को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एआई पर किए गए भारी खर्च को स्थायी और पर्याप्त मुनाफे में कैसे बदला जाए।

तकनीक विकसित करने और उसे बड़े स्तर पर संचालित करने की लागत काफी अधिक है। इसके मुकाबले बाजार से मिलने वाला राजस्व अभी उस स्तर का भरोसा नहीं दे पा रहा है, जिसकी उम्मीद निवेशकों ने लगाई थी। इसी वजह से एआई कारोबार से जुड़ी कंपनियों के भविष्य और उनके शेयरों के मूल्यांकन को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है।

अमेरिकी शेयर बाजार में एक दिन में 2.5 ट्रिलियन डॉलर की गिरावट

एआई को लेकर बढ़ती चिंता का सबसे बड़ा असर अमेरिकी शेयर बाजार में देखने को मिला है। रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार को Nasdaq-100 में मार्च 2020 के बाद एक दिन में लगभग 6 प्रतिशत की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। एआई कारोबार से जुड़ी कई अमेरिकी कंपनियों के शेयरों में तेज बिकवाली हुई और कुछ शेयरों में गिरावट 25 प्रतिशत तक पहुंच गई।

गुरुवार को अमेरिकी शेयर बाजार में करीब 2.5 ट्रिलियन डॉलर की बाजार पूंजी घट गई। इसमें लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान केवल एआई से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में गिरावट के कारण बताया गया है। इतनी बड़ी गिरावट ने निवेशकों को चिंता में डाल दिया है। बाजार में यह आशंका बढ़ रही है कि एआई के नाम पर कंपनियों के मूल्यांकन में जो तेजी आई थी, वह वास्तविक कमाई और कारोबारी प्रदर्शन के मुकाबले कहीं अधिक तो नहीं थी।

अमेरिका ने एआई के विकास के लिए डेटा सेंटर, चिप निर्माण और तकनीकी बुनियादी ढांचे पर खरबों डॉलर का निवेश किया है। यदि एआई से अपेक्षित मुनाफा नहीं मिलता है या इसकी मांग में बड़ी गिरावट आती है, तो इसका असर केवल तकनीकी कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। निवेशकों, बैंकों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी इसका दबाव पड़ सकता है।

चीन ने भी एआई पर लगाया बड़ा दांव, अब वित्तीय बाजारों की चिंता बढ़ी

एआई के क्षेत्र में अमेरिका को चुनौती देने के लिए चीन ने भी बड़े स्तर पर निवेश किया है। चीन ने एआई हार्डवेयर, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर और तकनीकी स्टार्टअप के विकास पर काफी धन लगाया है। वहां के शेयर बाजार और तकनीकी उद्योग भी एआई से जुड़ी संभावनाओं पर निर्भर होते जा रहे हैं।

चीन के लिए एआई केवल नई तकनीक का विकास नहीं, बल्कि औद्योगिक उत्पादन, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने का माध्यम भी है। ऐसे में यदि एआई से जुड़ी कंपनियों को अपेक्षित कमाई नहीं होती या इस क्षेत्र में निवेश की रफ्तार धीमी पड़ती है, तो इसका असर चीनी वित्तीय बाजारों और औद्योगिक विकास पर पड़ सकता है।

पिछले कुछ दिनों से चीन के शेयर बाजारों में भी गिरावट का माहौल बताया गया है। ऐसे में एआई कारोबार को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने निवेशकों की चिंता और बढ़ा दी है। हालांकि इस क्षेत्र में आगे क्या स्थिति बनेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां अपने भारी निवेश को कितनी तेजी से वास्तविक कमाई में बदल पाती हैं।

दक्षिण कोरिया में बिकवाली इतनी तेज कि 20 मिनट रोकना पड़ा कारोबार

एआई से जुड़े संकट का असर केवल अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं है। दक्षिण कोरिया और ताइवान वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। एआई मॉडल को विकसित करने और संचालित करने के लिए अत्याधुनिक चिप की जरूरत होती है। Nvidia जैसी कंपनियों के लिए उन्नत एआई चिप के उत्पादन में ताइवान की TSMC और दक्षिण कोरिया की कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था में तकनीकी उद्योग और चिप निर्माण का बड़ा योगदान है। वहां की Samsung और SK Hynix जैसी कंपनियों ने एआई की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन क्षमता और बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश किया है। एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए उच्च क्षमता वाले सेमीकंडक्टर तथा HBM चिप की जरूरत होती है। इसी मांग को ध्यान में रखकर इन कंपनियों ने अपने कारोबार का विस्तार किया।

रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार को दक्षिण कोरिया के शेयर बाजार में भारी बिकवाली के कारण 20 मिनट तक कारोबार रोकना पड़ा। एआई से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में गिरावट ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है। यदि एआई चिप की मांग में अचानक कमी आती है, तो चिप निर्माता कंपनियों की कमाई और शेयर मूल्य पर असर पड़ सकता है। चूंकि दक्षिण कोरिया का निर्यात और शेयर बाजार तकनीकी क्षेत्र पर काफी निर्भर है, इसलिए एआई कारोबार में कमजोरी वहां की अर्थव्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकती है।

जापान ने एआई और रोबोटिक्स को माना था भविष्य का समाधान

जापान ने अपनी घटती आबादी और बुजुर्गों की बढ़ती संख्या जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए एआई और रोबोटिक्स को महत्वपूर्ण तकनीकी समाधान के रूप में देखा है। वहां विनिर्माण, स्वास्थ्य सेवा और सेवा क्षेत्र में स्वचालन तथा एआई तकनीक पर बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है।

जापानी कंपनियां एआई आधारित परियोजनाओं और तकनीकी स्टार्टअप में पूंजी लगा रही हैं। SoftBank ऐसी कंपनियों में शामिल है, जिसने एआई स्टार्टअप और नई तकनीकों में बड़े निवेश किए हैं। जापान की उम्मीद है कि एआई और रोबोटिक्स की मदद से कामकाज की दक्षता बढ़ाई जा सकेगी और श्रम से जुड़ी चुनौतियों का समाधान निकाला जा सकेगा।

लेकिन यदि एआई परियोजनाएं अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहती हैं या आर्थिक रूप से टिकाऊ साबित नहीं होतीं, तो SoftBank जैसे बड़े निवेशकों को वित्तीय नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में जापान के लिए भी एआई में किए गए निवेश से वास्तविक लाभ हासिल करना महत्वपूर्ण हो गया है।

भारत के आईटी क्षेत्र और रोजगार पर भी पड़ सकता है असर

एआई से जुड़ी वैश्विक अनिश्चितता भारत जैसे विकासशील देशों के लिए भी चुनौती पैदा कर सकती है। भारत सॉफ्टवेयर विकास, सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) के बड़े केंद्रों में शामिल है। इन क्षेत्रों में वैश्विक कंपनियों के साथ भारतीय कंपनियां भी काम करती हैं।

यदि एआई तकनीक को लेकर कंपनियों की निवेश रणनीति बदलती है या एआई आधारित सेवाओं की मांग में उतार-चढ़ाव आता है, तो इसका असर भारत के सेवा क्षेत्र और रोजगार बाजार पर पड़ सकता है। वैश्विक डिजिटल श्रम बाजार से जुड़े कारोबार में अस्थिरता आने पर भारतीय आईटी कंपनियों और उनसे जुड़े कर्मचारियों को भी नई परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।

दूसरी ओर, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय देश एआई के नियमन और इसके इस्तेमाल से जुड़े नियमों को विकसित करने में आगे हैं। हालांकि तकनीक के उत्पादन और अत्याधुनिक एआई ढांचे के मामले में ये देश काफी हद तक अमेरिकी और चीनी कंपनियों पर निर्भर हैं। इसलिए एआई क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर आने वाला कोई बड़ा बदलाव यूरोप के तकनीकी और कारोबारी ढांचे को भी प्रभावित कर सकता है।

एआई कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुनाफे का रास्ता

एआई क्षेत्र में मौजूदा दबाव के पीछे सबसे बड़ी वजह भारी निवेश और उससे होने वाली कमाई के बीच का अंतर बताया जा रहा है। उद्योग विशेषज्ञों की चिंताओं के मुताबिक, कई कंपनियों ने एआई के विकास और विस्तार के लिए बड़ी रकम खर्च की है। कुछ कंपनियों ने इसके लिए कर्ज का भी सहारा लिया है। ऐसे में यदि एआई सेवाओं से पर्याप्त राजस्व नहीं आता है, तो उनके लिए निवेश की लागत और कर्ज चुकाना मुश्किल हो सकता है।

एआई मॉडल तैयार करने के लिए शक्तिशाली कंप्यूटर, चिप, बिजली, डेटा सेंटर और तकनीकी विशेषज्ञों की जरूरत होती है। इन सभी पर लगातार खर्च करना पड़ता है। केवल तकनीक विकसित कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कंपनियों को ऐसी सेवाएं भी तैयार करनी होंगी, जिनके लिए ग्राहक भुगतान करने को तैयार हों। यदि कंपनियों को नियमित और स्थायी आय नहीं मिलती है, तो उनके कारोबारी मॉडल पर सवाल उठ सकते हैं।

यही वजह है कि निवेशक अब एआई कंपनियों के भविष्य को लेकर अधिक सतर्क दिखाई दे रहे हैं। पहले जहां एआई से जुड़ी घोषणाओं और भविष्य की संभावनाओं पर शेयरों में तेजी देखने को मिलती थी, वहीं अब निवेशक कंपनियों की वास्तविक कमाई, खर्च और मुनाफे की क्षमता पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।

क्या सचमुच फूटने वाला है एआई का बुलबुला?

एआई क्षेत्र में शेयर बाजार की गिरावट और निवेशकों की चिंता ने इस सवाल को जन्म दिया है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता का मौजूदा उत्साह एक बड़े आर्थिक बुलबुले में बदल गया था। हालांकि शेयरों में गिरावट को अपने आप में एआई तकनीक की विफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह भी संभव है कि बाजार में कंपनियों के मूल्यांकन, निवेश की लागत और भविष्य की कमाई को लेकर नए सिरे से आकलन हो रहा हो।

फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एआई पर खर्च की गई विशाल पूंजी से कंपनियां कितना राजस्व और मुनाफा हासिल कर पाती हैं। यदि तकनीक का इस्तेमाल बढ़ता है और कंपनियां उसके आधार पर स्थायी कमाई का रास्ता तैयार कर लेती हैं, तो मौजूदा दबाव के बावजूद यह क्षेत्र आगे बढ़ सकता है। लेकिन यदि निवेश के मुकाबले कमाई कमजोर रहती है, तो कंपनियों को अपनी योजनाओं और खर्च में बदलाव करना पड़ सकता है।

एआई की दौड़ में अब असली परीक्षा

कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर दुनिया भर में पैदा हुआ उत्साह अब निवेश, मुनाफे और आर्थिक जोखिम की कसौटी पर परखा जा रहा है। अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों ने इस तकनीक पर बड़ी पूंजी लगाई है, जबकि भारत जैसे देशों के आईटी और सेवा क्षेत्र पर भी इसके प्रभाव की आशंका है। शेयर बाजार में आई गिरावट ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि एआई से जुड़ी उम्मीदें कितनी व्यावहारिक हैं। आने वाले समय में कंपनियों की वास्तविक कमाई और निवेश पर मिलने वाला लाभ ही तय करेगा कि एआई की यह दौड़ तकनीकी क्रांति साबित होगी या जरूरत से ज्यादा उम्मीदों के कारण खड़ा हुआ आर्थिक दबाव।